कोलकाता /भारत
- हाइलाइट :
- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के रिश्तों में फिर से तल्खी आ गई है।
- ममता बनर्जी के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद कांग्रेस ने भी राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है।
- सवाल यह है कि कांग्रेस किस मुद्दे और किस रणनीति के साथ मतदाताओं के बीच जाएगी।
ममता के ऐलान से बदली सियासी तस्वीर
पश्चिम बंगाल में अप्रैल–मई में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा यह स्पष्ट कर देने के बाद कि तृणमूल कांग्रेस किसी भी सहयोगी दल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं करेगी, कांग्रेस और तृणमूल के बीच संभावित तालमेल की सभी अटकलों पर विराम लग गया। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने भी ऐलान किया कि वह राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस पहले से ही संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।
एजेंडा वही, भूमिका सीमित?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में कांग्रेस की भूमिका कुछ हद तक वैसी ही हो सकती है जैसी हाल के वर्षों में दिल्ली और बिहार में देखने को मिली है। यानी पार्टी चुनाव तो लड़ेगी, लेकिन मुख्य मुकाबला अन्य दलों के बीच ही सिमटा रहेगा। कांग्रेस के संभावित एजेंडे में बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, केंद्र–राज्य टकराव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं। हालांकि, चुनौती यह है कि क्या कांग्रेस इन मुद्दों को ममता बनर्जी की मजबूत राजनीतिक पकड़ और तृणमूल के संगठित कैडर के सामने प्रभावी ढंग से उठा पाएगी।
चुनावी लड़ाई में कांग्रेस की रणनीति की परीक्षा
कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रासंगिकता का भी इम्तिहान है। अकेले चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी को अपनी स्वतंत्र पहचान दिखाने का मौका देता है, लेकिन इसके साथ ही संगठन, नेतृत्व और जमीनी मुद्दों पर स्पष्टता की भी मांग करता है। आने वाले हफ्तों में यह साफ होगा कि कांग्रेस बंगाल में वैकल्पिक राजनीति का भरोसेमंद चेहरा बन पाती है या फिर यह मुकाबला भी तृणमूल बनाम अन्य शक्तियों तक ही सीमित रह जाएगा।
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