नई दिल्ली
हाइलाइट :
• पीएमओ के निर्देशों पर जॉन ब्रिटास ने जताई आपत्ति
• पीएम केयर फंड पर सवाल पूछने से रोकने का विरोध
• संसद की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा लोकसभा सचिवालय को दिए गए उस निर्देश पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है, जिसमें कहा गया है कि पीएम केयर फंड से जुड़े किसी भी प्रश्न को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। पीएमओ का तर्क है कि यह फंड पूरी तरह स्वैच्छिक सार्वजनिक योगदान से बना है और इसमें सरकार का कोई प्रत्यक्ष बजटीय आवंटन नहीं है। इसी आधार पर इसे संसदीय प्रश्नों के दायरे से बाहर बताया गया है।
सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने इस रुख का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पीएमओ की यह व्याख्या कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। उनका कहना है कि जब किसी फंड का नाम, प्रशासनिक संरचना और संचालन सरकार से जुड़े शीर्ष पदों से संबंधित हो, तो उस पर संसद में सवाल उठना स्वाभाविक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ब्रिटास के अनुसार, केवल ‘स्वैच्छिक योगदान’ का हवाला देकर पारदर्शिता से बचा नहीं जा सकता।
ब्रिटास ने यह भी रेखांकित किया कि संसद जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने का सर्वोच्च मंच है। ऐसे में किसी फंड को संसदीय निगरानी से बाहर रखना न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह एक खतरनाक मिसाल भी कायम कर सकता है। उन्होंने मांग की कि पीएम केयर फंड से जुड़े सभी पहलुओं पर संसद में खुली और स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए।
ख़बरें और भी…


