नई दिल्ली /भारत
व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट में भारत द्वारा 500 अरब डॉलर तक अमेरिकी सामान खरीदने का दावा किया गया है, लेकिन न तो इसकी समयसीमा स्पष्ट है और न ही यह तय है कि यह बाध्यकारी प्रतिबद्धता है या केवल दीर्घकालिक अनुमान। इससे प्रस्तावित समझौते की अस्थायी प्रकृति उजागर होती है।
व्हाइट हाउस द्वारा भारत के साथ एक “ऐतिहासिक” व्यापार समझौते की घोषणा करते हुए जारी की गई फैक्ट शीट में बड़े और आकर्षक दावे तो हैं, लेकिन उनके पीछे ठोस स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है। दस्तावेज़ में भारत द्वारा 500 अरब डॉलर तक के अमेरिकी उत्पाद खरीदने के इरादे पर जोर दिया गया है, मगर यह नहीं बताया गया कि यह लक्ष्य किस अवधि में पूरा किया जाएगा। कुछ रिपोर्टों में पांच साल की समयसीमा का उल्लेख जरूर किया जा रहा है, लेकिन आधिकारिक दस्तावेज़ इस पर मौन है।
इस आंकड़े की प्रकृति को लेकर भी दोनों देशों की व्याख्याएं अलग-अलग बताई जा रही हैं। अमेरिकी पक्ष इसे एक प्रकार की ठोस, बाध्यकारी प्रतिबद्धता के रूप में देख रहा है, जबकि भारत इसे दीर्घकालिक और महत्वाकांक्षी अनुमान मानता है, जो बाजार स्थितियों और भविष्य की वार्ताओं पर निर्भर करेगा। यही अंतर इस समझौते को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।
वास्तव में, यह अस्पष्टता उस समझौते की अस्थायी स्थिति को उजागर करती है जिसे वाशिंगटन में बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। व्यापक अमेरिका-भारत फ्रेमवर्क समझौते के अनावरण के कुछ दिनों बाद आई यह फैक्ट शीट राजनीतिक सहमति को ठोस परिणामों में बदलने का प्रयास जरूर करती है, लेकिन कई विवादास्पद व्यापार मुद्दों को भविष्य की बातचीत के लिए टाल देती है। भाषा भले ही आत्मविश्वासपूर्ण हो, पर संकेत साफ हैं कि दोनों देश अभी भी एक अंतरिम व्यवस्था के तहत ही आगे बढ़ रहे हैं।
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