राखी श्रीवास्तव /स्वतंत्र छत्तीसगढ़
झारखण्ड: 03 अक्टूबर 25—विजयादशमी के पावन अवसर पर गुरुवार को झारखंड के कई जिलों — जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद और रांची — में पारंपरिक ‘सिंदूर खेला’ का आयोजन बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया। दुर्गा पूजा के समापन पर विवाहित महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर अपने दांपत्य जीवन की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
सुबह से ही पूजा पंडालों में महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। ढोल-ढाक की गूंज और उत्सव के उल्लास के बीच सभी ने परंपरा निभाते हुए एक-दूसरे की मांग में सिंदूर भरा और शुभकामनाएं दीं। इस रस्म की शुरुआत मां दुर्गा की प्रतिमा को सिंदूर चढ़ाने से हुई। इसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मंगलकामनाओं का आदान-प्रदान किया।
लाल किनारी वाली सफेद साड़ियों में सजी महिलाएं माता की विदाई से पहले भावुक नजर आईं। उनके चेहरे पर एक ओर उल्लास और मुस्कान थी, तो दूसरी ओर विदाई के क्षण में आंखें नम भी हो उठीं। कई पंडालों में पूजा समितियों ने महिलाओं की सुविधा के लिए विशेष मंच तैयार किए थे। वहीं, युवाओं और बच्चों ने इस पूरे रंगीन दृश्य को कैमरे में कैद किया।
पुजारियों का कहना है कि सिंदूर खेला केवल एक रस्म नहीं, बल्कि यह स्त्री शक्ति, आपसी स्नेह और एकजुटता का प्रतीक है। यह बंगाली संस्कृति की पहचान है, किंतु अब झारखंड में भी इसे पूरे उत्साह से मनाया जाने लगा है।
सिंदूर खेला का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:
सिंदूर खेला मूलतः बंगाली समुदाय की परंपरा है, लेकिन झारखंड में भी यह अब सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। विवाहित महिलाएं इस अवसर पर मां दुर्गा से अपने वैवाहिक जीवन की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। यह परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ने के साथ-साथ महिलाओं के आपसी सौहार्द, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव भावना का प्रतीक है।
रंग-बिरंगी साड़ियों में सजी महिलाएं नृत्य, गीत और पारंपरिक मिठाइयों का आनंद लेती रहीं। पूरे राज्य में भक्ति और उल्लास का ऐसा माहौल बना जिसने दुर्गा पूजा के समापन को अविस्मरणीय बना दिया। सिंदूर खेला के जरिए महिलाओं ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि परंपराओं में निहित आस्था, शक्ति और एकता आज भी समाज को जोड़ने का कार्य कर रही है।
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