स्वतंत्र छत्तीसगढ़ डिजिटल डेस्क
राजस्थान के जैसलमेर-जोधपुर हाईवे पर मंगलवार को हुई भीषण बस आग दुर्घटना ने पूरे प्रदेश को शोक में डुबो दिया है। हादसे में जलकर खाक हुए 20 यात्रियों की पहचान बेहद कठिन हो गई है, जिसके चलते अब डीएनए सैंपलिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल और जैसलमेर के जवाहिर अस्पताल में परिजनों के दो-दो सदस्यों के नमूने लिए जा रहे हैं, ताकि मृतकों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान संभव हो सके।
देर रात जोधपुर पहुंचे 19 शव, हड्डियों की पोटली भी मिली
मंगलवार देर रात 19 शवों को जैसलमेर से जोधपुर लाया गया। इनमें से कई शरीर जलकर बस की बॉडी से चिपक गए थे, जबकि एक पोटली में केवल हड्डियां ही मौजूद थीं। एक मृतक का शव पहले से ही जोधपुर में था। हालत इतनी भयावह थी कि कई शव पहचान से परे हैं, मानो कोयले में बदल गए हों।
हादसा कैसे हुआ? पटाखों और शॉर्ट सर्किट के बीच अटकी वजह
दुर्घटना दोपहर लगभग 3:30 बजे हुई, जब एसी स्लीपर बस में अचानक आग भड़क उठी। आग की वजह को लेकर कई तरह के दावे सामने आ रहे हैं:
- शॉर्ट सर्किट से आग लगने की आशंका
- एसी कंप्रेशर पाइप फटने का दावा
- स्थानीय लोगों का आरोप: बस की डिग्गी पटाखों से भरी थी, जिससे धमाके हुए
बस में केवल एक ही दरवाजा था, जिससे लोग बाहर नहीं निकल सके और अंदर फंसकर जिंदा जल गए।
लहूलुहान इंसानियत: एक ही परिवार के 5 लोग, पत्रकार भी शामिल
इस अग्निकांड में
- एक ही परिवार के 5 लोगों की दर्दनाक मौत
- पत्रकार राजेंद्र चौहान भी इस त्रासदी का शिकार बने
- लगभग 15 यात्री 70% तक झुलस गए, जिनमें एक कपल शामिल है, जो प्री-वेडिंग शूट कराकर लौट रहा था
प्रत्यक्षदर्शी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर बोले
“पीछे से धमाके की आवाज आई। शायद एसी का कंप्रेशर फटा। आग इतनी भीषण थी कि कुछ लोग खाक हो गए। जिन्हें बाहर निकाला जा सका, आर्मी ने निकाला, पर कई शरीर पहचान से बाहर हो चुके थे।”
सरकार का राहत पैकेज: प्रधानमंत्री ने जताया शोक
- मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपये
- घायलों को 50 हजार रुपये
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर पोस्ट कर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि जैसलमेर की दुर्घटना ने मन व्यथित कर दिया है।
डीएनए रिपोर्ट का इंतज़ार, बिलखते परिजन अस्पतालों में डटे
पीड़ित परिवारों के सदस्य अपने लापता प्रियजनों की झलक तक पाने को बेताब हैं। भारी सुरक्षा के बीच डीएनए सैंपलिंग हो रही है, ताकि कम से कम अंतिम विदाई सम्मानपूर्वक की जा सके।
यह सिर्फ एक हादसा नहीं, सिस्टम से सवाल है…
- स्लीपर बसों में सुरक्षा जांच क्यों नहीं होती?
- क्या पटाखों जैसी खतरनाक सामग्री की जांच नहीं की जाती?
- एक ही दरवाज़े पर यात्रियों की जान क्यों छोड़ी गई?
यह त्रासदी केवल मौतों की संख्या नहीं, बल्कि उन चीखों की गवाही है जो धुएं में खो गईं।
पहचान की इस लड़ाई में अब उम्मीद सिर्फ डीएनए रिपोर्ट्स पर टिकी है।


