दिल्ली/स्वतंत्र छत्तीसगढ़ डिजिटल डेस्क
नई दिल्ली: जेएनयू के पूर्व छात्र नेता शरजील इमाम ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाग लेने के लिए 14 दिनों की अंतरिम जमानत की मांग करते हुए दिल्ली की अदालत का रुख किया है। वह वर्तमान में 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए मामले में 25 अगस्त 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं और बहादुरगंज (बिहार) विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना चाहते हैं।
शरजील इमाम ने याचिका में खुद को “राजनीतिक कैदी और छात्र कार्यकर्ता” बताया है और कहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना उनका संवैधानिक अधिकार है। बिहार विधानसभा चुनाव 10 अक्टूबर से 16 नवंबर तक दो चरणों में होने हैं, जबकि बहादुरगंज सीट पर मतदान 11 नवंबर को निर्धारित है।
दाखिल आवेदन में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 483 का उल्लेख करते हुए 15 से 29 अक्टूबर तक अंतरिम रिहाई का अनुरोध किया गया है। उन्होंने तर्क दिया है कि वह गिरफ्तारी के बाद से एक बार भी ज़मानत पर रिहा नहीं हुए हैं और उनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि नामांकन दाखिल करने और चुनावी अभियान की तैयारियों के लिए उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक है, क्योंकि परिवार में केवल उनका छोटा भाई है जो बीमार मां की देखभाल में व्यस्त है और चुनाव से जुड़ी सहायता उपलब्ध नहीं करा सकता।
शरजील ने अपने आवेदन में पूर्व उदाहरणों का हवाला देते हुए दावा किया है कि कई राजनीतिक नेताओं, जिनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं, को चुनाव प्रचार हेतु अंतरिम राहत प्रदान की गई थी। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय तथा बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए अन्य फैसलों को भी आधार बनाया गया है।
उनका कहना है कि “अंतरिम ज़मानत से इनकार करना, मुझे चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करने जैसा होगा।” यह केवल कानूनी व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की परीक्षा भी है।
ज्ञात हो कि 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में भड़की हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस मामले में कुल 18 आरोपियों पर यूएपीए सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें उमर खालिद, ताहिर हुसैन, देवांगना कलिता, नताशा नरवाल, सफूरा जरगर आदि शामिल हैं।
याचिका कड़कड़डूमा कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना है, जहां यह तय होगा कि क्या एक आरोपित, जो अभी दोषी सिद्ध नहीं हुआ, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर जनता के बीच जा सकता है या नहीं।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की जमानत नहीं, बल्कि उस गहरे प्रश्न का केंद्र है कि क्या भारत के लोकतंत्र में चुनाव लड़ने का अधिकार अदालत की स्वीकृति पर निर्भर होना चाहिए, या जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर दिया जाना चाहिए।
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