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Wednesday, February 11, 2026

‘प्रत्याघात’ सिर्फ शब्द नहीं, न्याय की खोज है, विश्व पुस्तक मेला-2026 में ब्रह्मवीर सिंह के उपन्यास का लोकार्पण…

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  • विश्व पुस्तक मेला-2026, भारत मंडपम में उपन्यास ‘प्रत्याघात’ का विमोचन
  • सुप्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल ने किया लोकार्पण
  • ‘बुत मरते नहीं’ का अगला भाग, असत्य पर न्याय की साहित्यिक प्रति
  • साहित्य, पत्रकारिता और समाज के बीच संवेदनशील संवाद

विश्व पुस्तक मेले में साहित्यिक क्षण

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित विश्व पुस्तक मेला-2026 के दौरान रविवार को हिंदी साहित्य को एक महत्वपूर्ण कृति मिली। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक ब्रह्मवीर सिंह के उपन्यास ‘प्रत्याघात’ का लोकार्पण सुप्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल ने किया। यह उपन्यास उनकी चर्चित रचना ‘बुत मरते नहीं’ का दूसरा भाग है, जो पूर्व कथा को आगे बढ़ाते हुए समाज, नैतिकता और सत्य-असत्य के द्वंद्व को गहराई से प्रस्तुत करता है। लोकार्पण समारोह में पद्मश्री से सम्मानित कवि डॉ. सुनील जोगी, लेखक-कवि एवं दैनिक हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक प्रताप सोमवंशी और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हिमांशु द्विवेदी की गरिमामयी उपस्थिति रही। उपन्यास का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन द्वारा किया गया है।

असत्य की जीत से न्याय की प्रति तक

लेखक ब्रह्मवीर सिंह ने कहा कि ‘बुत मरते नहीं’ में असत्य की जीत और नायक की त्रासदी ने पाठकों को भीतर तक विचलित किया था। उसी अन्याय के प्रति उत्तर के रूप में ‘प्रत्याघात’ सामने आया है। यह उपन्यास उन सभी लोगों की कहानी है, जो जीवन में हताशा, अवसाद और टूटन से गुजरे, लेकिन भीतर से समाप्त नहीं हुए। प्रताप सोमवंशी ने उपन्यास की वैचारिक गहराई की सराहना करते हुए कहा कि इसकी पंक्तियां पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक मुक्तिबोध की चेतना से जुड़ा हुआ हो। उन्होंने पत्रकारों से साहित्य सृजन के लिए समय निकालने की अपील करते हुए कहा कि पत्रकारिता के अनुभव साहित्य को असाधारण समृद्धि प्रदान कर सकते हैं।

किताबें ही समाज की चेतना हैं

कार्यक्रम में कवि डॉ. सुनील जोगी ने कहा कि उपन्यास की पहली पंक्ति ही पाठक को झकझोर देती है और आज के समय में जीवन व उसके रस को खोजने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने इसे ब्रह्मवीर सिंह की अब तक की रचनाओं से अलग और अधिक परिपक्व कृति बताया। वहीं प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार ने विश्वास जताया कि ‘प्रत्याघात’ भी ‘बुत मरते नहीं’ की तरह साहित्यिक जगत में अपनी सशक्त पहचान बनाएगा। अंत में लेखक ने मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलकर पुस्तकों की ओर लौटने की अपील करते हुए कहा कि जो शब्द किताबों में दर्ज हो जाते हैं, उन्हें मिटाया नहीं जा सकता।

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