बिलासपुर/छत्तीसगढ़
हाईलाइट बॉक्स
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) दायर करने वालों के लिए सुरक्षा राशि को 5,000 से बढ़ाकर 15,000 रुपए किया है। नए नियम के तहत यह राशि बिना जमा किए सुनवाई नहीं होगी। कोरबा के DMF में अनियमितता से जुड़ी याचिका में फीस कम करने का आवेदन निरस्त कर दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि याचिका वास्तव में जनहित में साबित होती है, तो जमा कराई गई राशि वापस की जा सकती है।
नए नियम से याचिकाकर्ताओं पर वित्तीय बोझ: न्यायपालिका का तर्क
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक आदेश जारी करते हुए जनहित याचिका दायर करने वालों के लिए सुरक्षा राशि 15,000 रुपए रखने का निर्णय लागू कर दिया है। पहले यह राशि 5,000 रुपए थी, जिसे अब तीन गुना बढ़ाकर 15,000 रुपए कर दिया गया है। हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच (चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा तथा जस्टिस अरविंद वर्मा) ने स्पष्ट किया कि यह राशि जमा किए बिना कोई भी जनहित याचिका न्यायालय में सुनी नहीं जाएगी। कोर्ट की यह सख्ती यह सुनिश्चित करने के इरादे से है कि गंभीर और सूचित याचिकाकर्ता ही जनहित याचिका दायर करें, तथा दुरुपयोग और अनावश्यक मामलों से न्यायिक समय की बर्बादी रोकी जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि याचिकाकर्ता यह साबित कर पाए कि उनकी याचिका वास्तव में जनहित में है, तो बाद में सुरक्षा राशि वापस की जा सकती है। इस प्रावधान का मकसद याचिकाकर्ताओं को आर्थिक बोझ से डरने से बचाना है, जबकि न्यायपालिका का पक्ष यह भी है कि न्यायालय के संसाधनों का बुद्धिमानी से उपयोग होना चाहिए।
DMF अनियमितता मामले में फीस छूट का दावा खारिज
कोर्ट के इस नए आदेश का सीधा असर कोरबा जिले में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) में कथित अनियमितताओं से जुड़ी एक जनहित याचिका पर पड़ा। याचिकाकर्ता लक्ष्मी चौहान, अरुण श्रीवास्तव, और सपूरन दास की ओर से दायर इस याचिका को लेकर उनके वकील ने सुरक्षा राशि कम करने या छूट देने का आवेदन किया था, क्योंकि पुराने नियम के अनुसार यह राशि 5,000 रुपए थी और अब तीन गुना बढ़ा दी गई है।
याचिकाकर्ताओं के वकील का तर्क था कि राशि में अचानक वृद्धि न्यायसंगत नहीं है और इसके चलते सामान्य नागरिकों को न्याय तक पहुंचना कठिन हो जाएगा। हालांकि कोर्ट ने इस दलील को नहीं स्वीकार किया और कहा कि नियम सभी याचिकाकर्ताओं पर समान रूप से लागू होंगे, तथा यह राशि दायर याचिका की गंभीरता, प्रकृति और न्यायालय के समय के उचित उपयोग को ध्यान में रखकर तय की गई है।
कोर्ट के आदेश में यह स्पष्ट स्थिति भी जताई गई है कि यदि तय समय सीमा के भीतर सुरक्षा राशि जमा नहीं की गई, तो याचिका को स्वतः निरस्त माना जाएगा। इस दिशा में कोर्ट ने यह निर्देश भी जारी किया है कि अगली सुनवाई 12 जनवरी को होगी, और तब तक याचिकाकर्ताओं को 15,000 रुपए की सुरक्षा राशि जमा करानी अनिवार्य होगी।
याचिका में DMF के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप
कोरबा जिले की जनहित याचिका में DMF के प्रबंधन और निधियों के उपयोग पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में लगभग 4,000 करोड़ रुपए के उपयोग में नियमों और गाइडलाइन का उल्लंघन किया गया। याचिका में यह भी कहा गया कि प्रभावित परिवारों को नौकरियों और अवसरों से वंचित रखा गया, कुछ मामलों में मनमाने तरीके से भवन निर्माण पर खर्च किया गया, तथा कई पात्र लाभार्थियों को उनके हक से वंचित रखा गया।
याचिकाकर्ताओं का यह भी आरोप रहा कि DMF के तहत होने वाले कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है, जिससे संसाधनों का सत्य और न्यायपूर्ण उपयोग नहीं हुआ। याचिका में संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट रिपोर्ट और ऑडिट प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया है। इसके बावजूद कोर्ट ने सुरक्षा राशि में छूट न देने का निर्णय लेते हुए यह दिखाया कि न्यायिक प्रक्रिया में वित्तीय दायित्व भी गंभीरता से लिया जाएगा।
मानविय असर और आगे की प्रक्रिया
नए नियम के कारण आम नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, विशेषकर उन याचिकाओं में जो सामाजिक न्याय, आर्थिक पारदर्शिता और सरकारी दायित्वों की जांच जैसे विषयों पर आधारित हैं। सुरक्षा राशि की वृद्धि का समर्थन करने वाले न्यायिक पक्ष का कहना है कि इससे अनावश्यक याचिकाओं में गिरावट आएगी तथा न्यायपालिका का समय और संसाधन बचेंगे। आलोचक यह तर्क देते हैं कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग के नागरिकों की न्याय तक पहुंच कठिन हो सकती है।
कोर्ट ने अगले चरण में 12 जनवरी की सुनवाई सुनिश्चित की है, जिसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा जमा कराई गई राशि और याचिका की गंभीरता के आधार पर आगे की कार्यवाही तय होगी। याचिकाकर्ता अब यह सबूत देंगे कि उनकी याचिका सार्वजनिक और समाजिक हित में है, ताकि सुरक्षा राशि वापस मिलने की प्रक्रिया शुरू हो सके।


