जी.भूषण / रायपुर
बांग्लादेश एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक चुनावों की आहट के बीच राजनीतिक विमर्श तेज़ी से राष्ट्रवादी बयानबाज़ी की ओर मुड़ गया है। शेख़ हसीना की अवामी लीग के चुनावी मैदान से बाहर होने के बाद सत्ता की दौड़ में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी गठबंधन आमने-सामने हैं। इस प्रतिस्पर्धा में भारत समर्थक या भारत-विरोधी रुख को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की होड़ साफ़ दिख रही है, जो न सिर्फ़ चुनावी बहस की दिशा बदल रही है, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को भी संकीर्ण बना रही है।
इतिहास गवाह है कि बांग्लादेश की राजनीति में राष्ट्रवाद और पहचान का प्रश्न हमेशा प्रभावशाली रहा है। लेकिन इस बार भारत को केंद्र में रखकर भावनाएँ भड़काने की रणनीति, वास्तविक मुद्दों—महँगाई, रोज़गार, शासन-प्रणाली और संस्थागत भरोसे—को हाशिये पर धकेलती नज़र आती है। बीएनपी और जमात गठबंधन के बीच यह प्रतिस्पर्धा कि कौन अधिक “स्वतंत्र” या “कम भारत-परस्त” दिखे, अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, पर दीर्घकाल में यह देश की विदेश नीति और सामाजिक ताने-बाने के लिए जोखिमपूर्ण है।
भारत-बांग्लादेश संबंध केवल कूटनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति और आर्थिक निर्भरता से जुड़े हैं। इन्हें चुनावी नारों में समेटकर सरलीकृत करना, जनता के विवेक के साथ अन्याय है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि मतदाता भावनात्मक उकसावे के बजाय नीतियों, जवाबदेही और भविष्य की दृष्टि पर मतदान करे। राष्ट्रवाद का अर्थ बाहरी “दुश्मन” गढ़ना नहीं, बल्कि आंतरिक चुनौतियों का साहसिक समाधान ढूँढना होना चाहिए।
अंततः, बांग्लादेश के लिए यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता की परीक्षा है। यदि राष्ट्रवादी बयानबाज़ी ही चुनावी विमर्श को परिभाषित करती रही, तो लोकतंत्र का उद्देश्य खोखला हो जाएगा। समय की मांग है कि राजनीतिक दल भारत-विरोध या भारत-समर्थन के शोर से ऊपर उठकर, जनता के जीवन से जुड़े ठोस मुद्दों पर ईमानदार बहस करें—यही बांग्लादेश के लोकतंत्र के हित में होगा।


