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हिंदी साहित्य के मौन महाकवि विनोद कुमार शुक्ल का निधन, एक युग का अंत…

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रायपुर /छत्तीसगढ़

प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का आज रायपुर स्थित एम्स (आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़) में निधन हो गया। लंबी बीमारी के बाद 88/89 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली, जिससे हिंदी साहित्य जगत एक विराट व्यक्तित्व को खो दिया। शुक्ल को उनके सरल, संवेदनशील और गहन लेखन के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था और वे आधुनिक हिंदी साहित्य के स्वतंत्र, मौलिक स्वर माने जाते थे।

शुक्ल का जन्म छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 1937 में हुआ था और उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा लगभग पांच दशक तक जारी रखी। उनके कई उपन्यास जैसे “नौकर की कमीज़”, “दीवार में एक खिड़की रहती थी”, “खिलेगा तो देखेंगे” और “एक चुप्पी जगाह” आज भी हिंदी साहित्य में अनमोल रचनाएँ माने जाते हैं। उपन्यास “नौकर की कमीज़” पर उल्लेखनीय फिल्म भी बनी, जिसने साहित्य से सिनेमा तक उनके विचारों की पहुंच को और व्यापक किया।

उनकी लेखन शैली में प्रतिदिन की जिंदगी की सूक्ष्मताओं तथा आम इंसान के अनुभवों को बड़ी सहजता और मानवीय अंतर्दृष्टि के साथ व्यक्त करने की एक विशिष्ट क्षमता थी। शुक्ल को साहित्य जगत में कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, PEN/Nabokov पुरस्कार और भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (59वां) शामिल हैं। वे छत्तीसगढ़ से पहला ऐसा साहित्यकार थे जिन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया, और यह सम्मान उन्हें इसी वर्ष नवंबर में उनके निवास पर प्रदान किया गया था।

उनके निधन पर साहित्यकार, पाठक और विचारशील समुदाय ने गहरा शोक प्रकट किया है। शुक्ल की रचनाएँ आज भी पाठकों को जीवन की सादगी, गहराई और मानवीय अनुभवों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं, और उनकी याद हिन्दी साहित्य में एक अमिट छाप के रूप में बनी रहेगी।

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