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Monday, March 30, 2026

जब अस्पताल में मशीनें ही नहीं: प्रदेश के जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में जांच सुविधाओं का गहराता संकट…

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बिलासपुर/छत्तीसगढ़

हाइलाइट बॉक्स:
प्रदेश के कई सरकारी अस्पताल आज भी बुनियादी जांच सुविधाओं से वंचित हैं। आईसीयू, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी ने आम मरीजों को निजी अस्पतालों पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर दिया है।

जिला अस्पतालों में आईसीयू और सीटी स्कैन का अभाव
प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे की जमीनी हकीकत चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। राज्य के 9 जिला अस्पतालों में आज तक आईसीयू सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है, जबकि 12 जिला चिकित्सालय ऐसे हैं जहां सीटी स्कैन मशीन ही नहीं है। गंभीर मरीजों को जांच के लिए रायपुर या बिलासपुर रेफर किया जा रहा है। कई मामलों में समय पर जांच और इलाज न मिलने से मरीजों की हालत बिगड़ जाती है। मजबूरी में परिजन निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों का रुख करते हैं, जहां महंगा इलाज उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर देता है।

मेडिकल कॉलेजों की भी स्थिति संतोषजनक नहीं
सिर्फ जिला अस्पताल ही नहीं, बल्कि प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों की स्थिति भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। 10 मेडिकल कॉलेजों में से 6 में एमआरआई मशीन उपलब्ध नहीं है और 3 मेडिकल कॉलेजों में सीटी स्कैन की सुविधा ही नहीं है। महासमुंद और दुर्ग मेडिकल कॉलेजों में क्रिटिकल आईसीयू तक की व्यवस्था नहीं है। जगदलपुर, रायगढ़, राजनांदगांव, कोरबा, महासमुंद और दुर्ग ऐसे मेडिकल कॉलेज हैं, जहां एक भी एमआरआई मशीन नहीं है। वहीं कोरबा, महासमुंद और दुर्ग में सीटी स्कैन की सुविधा न होने से मरीजों को निजी जांच केंद्रों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

सोनोग्राफी और स्टाफ की कमी ने बढ़ाई परेशानी
हालांकि अधिकांश अस्पतालों में सोनोग्राफी मशीनें मौजूद हैं, लेकिन कई जगह वे महीनों से बंद पड़ी हैं। बिलासपुर स्थित सिम्स में 4 सोनोग्राफी मशीनें हैं, जिनमें से केवल 2 ही चालू हैं। रेडियोलॉजी विभाग में स्टाफ की भारी कमी है—सिर्फ दो रेडियोलॉजिस्ट पदस्थ हैं, जिनमें एक नियमित और एक बांड पर है। इसी कारण एक्स-रे, सोनोग्राफी, सीटी स्कैन और एमआरआई की रिपोर्ट के लिए मरीजों को महीनों इंतजार करना पड़ता है। प्रदेश के 10 मेडिकल कॉलेजों में कुल 7 सीटी स्कैन, 4 एमआरआई और 45 सोनोग्राफी मशीनें ही उपलब्ध हैं, जो जरूरत के मुकाबले नाकाफी हैं। संसाधनों और विशेषज्ञों की इस कमी का सीधा असर आम मरीज पर पड़ रहा है, जबकि निजी अस्पताल इस मजबूरी से लाभ कमा रहे हैं।

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