“रायगढ़ की पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान बनेगी ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत की पहचान — विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का नया मॉडल”

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हाइलाइट:

👉 2.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता वाली खदान से बढ़ेगा छत्तीसगढ़ का ऊर्जा योगदान
👉 सतह पर नहीं होगी खुदाई, खेती-जंगल रहेंगे सुरक्षित
👉 स्थानीय युवाओं को मिलेगा रोजगार, ग्राम विकास को नई गति
👉 पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का संतुलित उदाहरण बनेगी परियोजना

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

रायगढ़/रायपुर छत्तीसगढ़ :भारत आज ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है । जब पूरी दुनिया ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है , तब भारत ने विकास और संरक्षण के बीच संतुलन का रास्ता चुनकर एक मिसाल पेश की है । इसी सोच के तहत छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में प्रस्तावित पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान को देश की सतत विकास यात्रा का प्रतीक माना जा रहा है । यह परियोजना 25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता के साथ विकसित की जाएगी , जो भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में भी एक अहम कदम होगी ।

ऊर्जा का उत्पादन , पर प्रकृति की रक्षा भी

पुरुंगा खदान का डिजाइन पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित है । इसमें खनन प्रक्रिया 500 से 2000 फीट की गहराई में की जाएगी । सतह पर न तो विस्फोटक प्रयोग होगा और न ही भारी खुदाई , जिससे खेत , पेड़-पौधे , वनोपज और ग्रामीण आवास सुरक्षित रहेंगे । विशेषज्ञों के अनुसार , भूमिगत खनन से कृषि भूमि की उर्वरता बनी रहती है , और किसान पारंपरिक खेती जारी रख सकते हैं ।

वन्यजीवों के लिए भी रहेगा सुरक्षित वातावरण

आमतौर पर खनन से वन्यजीवों के प्रभावित होने की आशंका रहती है , लेकिन इस तकनीक में सतह पर मशीनरी या ट्रक संचालन की आवश्यकता नहीं होती । इस कारण हाथी , हिरण , सियार और पक्षियों जैसे जीवों के प्राकृतिक आवास में कोई व्यवधान नहीं आता । पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत खनन वन्यजीव संरक्षण और खनन विकास के बीच संतुलन की सबसे आधुनिक विधि है ।

धूल , शोर और प्रदूषण से राहत

पुरुंगा परियोजना में अत्याधुनिक तकनीक अपनाई जाएगी जिससे धूल , शोर और वायु प्रदूषण लगभग नगण्य रहेगा । आसपास के गाँवों और बस्तियों में रहने वाले लोगों को खुली खदानों जैसी असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा । साथ ही , खदान से निकलने वाले पानी को आधुनिक फिल्टरिंग प्रणाली से शुद्ध कर स्थानीय उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा ।

जलस्रोत और मृदा संरक्षण का ध्यान

खनन की गहराई 500 फीट से अधिक होने के कारण भूजल स्तर और ट्यूबवेलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा । भूमि की ऊपरी परत जस की तस रहेगी जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बरकरार रहेगी । वैज्ञानिक तरीके से की गई जल निकासी प्रक्रिया जल संसाधनों के संरक्षण और पुनः उपयोग को सुनिश्चित करेगी ।

ग्रामीणों को रोजगार और विकास के अवसर

पुरुंगा खदान स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और प्रशिक्षण के नए द्वार खोलेगी । साथ ही , परियोजना के कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व CSR कार्यक्रमों के तहत आसपास के गाँवों में शिक्षा , स्वास्थ्य , पेयजल और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा । ग्रामीण युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार योग्य बनाया जाएगा । रायगढ़ के एक स्थानीय किसान ने कहा , “अगर खेती सुरक्षित रहे और गाँव में रोजगार मिले , तो विकास का स्वागत करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है ।”

संवाद से सुलझेंगे मतभेद , नहीं टकराव से

कुछ वर्गों द्वारा भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है , लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भूमिगत खनन परियोजनाएँ सतही खनन की तुलना में कहीं अधिक पर्यावरण-अनुकूल हैं । इसलिए जरूरी है कि निर्णय तथ्यों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिए जाएँ , न कि भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टिकोण से ।

छत्तीसगढ़ की ऊर्जा यात्रा में नया अध्याय

छत्तीसगढ़ देश के कुल कोयला उत्पादन में लगभग 20 प्रतिशत योगदान देता है । पुरुंगा परियोजना इस योगदान को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगी । यह राज्य के औद्योगिक विकास को बल देगी और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी ।

सतत विकास की भारतीय दृष्टि

पुरुंगा जैसी परियोजनाएँ यह प्रमाण हैं कि भारत प्रकृति से टकराव नहीं , बल्कि सह-अस्तित्व का मार्ग चुन रहा है । कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के शब्दों में , “भूमिगत खनन भारत के ऊर्जा भविष्य का वह अध्याय है , जहाँ विकास और पर्यावरण दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं ।” यह परियोजना इस सोच को मूर्त रूप देती है कि धरती की गहराई से ऊर्जा निकालते हुए भी सतह पर हरियाली , जीवन और उम्मीदें कायम रखी जा सकती हैं । यही भारत के विकास की असली पहचान है — विकास भी , हरियाली भी ।

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