बिलासपुर: 19 जुलाई 2025
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक जीवन में निजता के अधिकार को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपनी पत्नी को उसकी निजी जानकारी जैसे मोबाइल फोन, संचार माध्यमों या बैंक खातों के पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। ऐसा करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा और यह घरेलू हिंसा की श्रेणी में भी आ सकता है।
यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने उस मामले में सुनाया, जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी की कॉल डिटेल रिकार्ड (CDR) प्राप्त करने की मांग की थी, ताकि उसे चरित्रहीन साबित किया जा सके। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आई-ए) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका फैमिली कोर्ट में दायर की थी और इसके समर्थन में दुर्ग के एसएसपी को आवेदन देकर पत्नी की कॉल डिटेल्स मांगी थीं। निचली अदालत ने यह मांग खारिज कर दी, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट ने कहा कि जब तलाक क्रूरता के आधार पर मांगा गया है और व्यभिचार का कोई आरोप नहीं है, तो पत्नी की कॉल डिटेल्स जैसी गोपनीय जानकारी मांगना न केवल अनुचित है, बल्कि उसके निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
न्यायालय ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों जैसे केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार (2017), पीयूसीएल बनाम भारत सरकार (1996) और मिस्टर एक्स बनाम हॉस्पिटल जेड (1998) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की यौन पहचान, वैवाहिक संबंधों की गरिमा और व्यक्तिगत अंतरंगता की सुरक्षा करता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक जीवन में पारदर्शिता और साझेदारी जरूरी है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि जीवनसाथी एक-दूसरे की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करें।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि घर या ऑफिस में की गई मोबाइल बातचीत अक्सर गोपनीय होती है और यह व्यक्ति के निजी जीवन का हिस्सा है, जिसमें दखल देना असंवैधानिक है।
हाई कोर्ट ने पति की याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के निर्णय को उचित और वैधानिक ठहराया। यह फैसला वैवाहिक संबंधों में निजता की गरिमा को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
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