बिलासपुर : 03 जुलाई 2025
कोरबा के दीपका गांव की निवासी निर्मला तिवारी की 0.21 एकड़ जमीन वर्ष 1981 में एसईसीएल की कोयला खदान परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। इसके बदले उन्हें 1985 में मुआवजा तो दे दिया गया, लेकिन नौकरी किसी फर्जी व्यक्ति नंदकिशोर जायसवाल को दे दी गई, जिसने खुद को उनका बेटा बताकर नियुक्ति हासिल कर ली।
निर्मला तिवारी ने धोखाधड़ी की जानकारी मिलने के बाद एसईसीएल प्रबंधन से शिकायत की और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार 2016 में नंदकिशोर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद जब उन्होंने अपने असली बेटे उमेश तिवारी को नौकरी देने की मांग की, तो एसईसीएल ने यह कहकर इनकार कर दिया कि अधिग्रहण के समय जमीन उनके नाम म्यूटेट नहीं थी और बेटा तब पैदा नहीं हुआ था।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एसईसीएल के इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि मुआवजा निर्मला तिवारी को मिला, इसका मतलब यही है कि वे जमीन की असली मालिक थीं। म्यूटेशन स्वामित्व का नहीं, कब्जे का प्रमाण होता है। कोर्ट ने माना कि यदि शुरू में गलती हुई थी, तो उसे सुधारते समय असली हकदार को अधिकार मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने एसईसीएल को आदेश दिया है कि उमेश तिवारी को 6 जुलाई 2017 से नौकरी पर नियुक्त किया जाए और उस तारीख से वेतन व अन्य लाभ भी प्रदान किए जाएं। यह फैसला पुनर्वास नीति और न्याय की लड़ाई में एक अहम मिसाल बन गया है।
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