छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में 10 फरवरी 2026 को जो दृश्य साकार हुआ, वह केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं था, बल्कि सामाजिक चेतना, समरसता और संवेदनशील शासन का जीवंत प्रतीक था। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के अंतर्गत एक ही दिन में 6,412 जोड़ों का विवाह और उसका गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होना, यह स्पष्ट करता है कि जब शासन की नीतियों में मानवीय दृष्टि जुड़ती है, तब योजनाएं आंकड़ों से आगे बढ़कर जीवन बदलने का माध्यम बन जाती हैं। यह आयोजन साबित करता है कि सामाजिक कल्याण केवल बजट और घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वह समाज के अंतिम व्यक्ति की गरिमा से जुड़ा विषय है।

भारतीय समाज में बेटी का विवाह लंबे समय तक एक आर्थिक और मानसिक चुनौती के रूप में देखा जाता रहा है, विशेषकर गरीब और वंचित परिवारों के लिए। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया है। 35 हजार रुपये की आर्थिक सहायता केवल राशि नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है जो सरकार ने जरूरतमंद परिवारों को दिया है। इससे एक ओर अनावश्यक कर्ज और सामाजिक दबाव कम होता है, वहीं दूसरी ओर बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर भी प्रभावी रोक लगती है। सामूहिक विवाह का स्वरूप दिखाता है कि सरकार विवाह को दिखावे और प्रतिस्पर्धा से निकालकर सादगी, सम्मान और समानता के मंच पर लाना चाहती है।
इस आयोजन का सबसे सशक्त पक्ष इसकी सामाजिक समरसता है। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध और बैगा जनजाति सहित विभिन्न समुदायों के जोड़ों का एक ही मंच पर, अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार विवाह होना, छत्तीसगढ़ की साझा संस्कृति की मजबूत तस्वीर पेश करता है। यह उस दौर में विशेष महत्व रखता है, जब समाज में कई बार विभाजन की रेखाएं गहरी होती दिखती हैं। मुख्यमंत्री का यह कहना कि यह केवल विवाह नहीं बल्कि सर्वधर्म समभाव का उत्सव है, अपने आप में शासन की वैचारिक दिशा को स्पष्ट करता है। यह आयोजन संदेश देता है कि विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

विश्व रिकॉर्ड का दर्ज होना इस कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय पहचान जरूर देता है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण इसका सामाजिक प्रभाव है। जब हजारों परिवार एक साथ सम्मान के साथ अपनी बेटियों का विवाह करते हैं, तो समाज में एक सकारात्मक मनोवैज्ञानिक बदलाव आता है। यह भावना मजबूत होती है कि सरकार केवल योजनाएं बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संकट और जरूरत के समय साथ खड़े रहने वाला भरोसेमंद सहयोगी है। यही विश्वास लोकतंत्र की असली नींव होता है।
इसी मंच से कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान की शुरुआत होना भी गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। विवाह जैसे सामाजिक आयोजन को स्वास्थ्य और पोषण से जोड़ना यह दर्शाता है कि सरकार सामाजिक विकास को समग्र दृष्टि से देख रही है। सरगुजा और बस्तर संभाग के आठ जिलों से शुरू हुआ यह पायलट प्रोजेक्ट इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कुपोषण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी से ही खत्म किया जा सकता है। यदि यह अभियान सफल होता है और पूरे प्रदेश में लागू किया जाता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत आधार बनेगा।
मुख्यमंत्री द्वारा अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं—महतारी वंदन योजना, तेंदूपत्ता संग्राहकों के हित में निर्णय, चरण पादुका योजना, श्रीरामलला दर्शन योजना और भूमिहीन मजदूरों को सहायता—का उल्लेख यह दिखाता है कि शासन की प्राथमिकता समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने की है। यह संतुलन ही विकास को टिकाऊ बनाता है। महिला एवं बाल विकास मंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों के वक्तव्यों से भी यह स्पष्ट होता है कि यह योजना किसी एक सरकार या व्यक्ति की नहीं, बल्कि निरंतरता और साझा प्रयास का परिणाम है।
सम्पादकीय दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का मॉडल है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह योजना आने वाले वर्षों में भी पारदर्शिता, समयबद्धता और मानवीय संवेदनशीलता के साथ लागू होती रहे। यदि ऐसा हुआ, तो यह पहल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकती है। अंततः, विकास वही सार्थक है जो समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के चेहरे पर आत्मसम्मान की मुस्कान ला सके—और इस आयोजन ने उसी दिशा में एक मजबूत कदम बढ़ाया है।


