भूषण राव
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी राज्य की आर्थिक और सामाजिक रीढ़ मानी जाती है। 15 नवंबर से शुरू होकर 31 जनवरी तक चलने वाली यह प्रक्रिया केवल एक प्रशासनिक गतिविधि नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका और भरोसे से जुड़ा विषय है। ऐसे में धान खरीदी के अंतिम चरण में एक कथित वायरल ऑडियो सामने आना, जिसमें टोकन न काटने और आवेदन पेंडिंग रखने जैसे निर्देश दिए जाने की बात कही जा रही है, व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। प्रशासन भले ही इसकी आधिकारिक पुष्टि न कर रहा हो, लेकिन जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए आरोप और किसानों की ज़मीनी हकीकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
सरकार के आंकड़े बताते हैं कि खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में 23.48 लाख किसान समर्थन मूल्य पर धान बेच चुके हैं और लगभग 29,600 करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका है। ये आंकड़े बड़े और प्रभावशाली हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये पूरी तस्वीर दिखाते हैं? यदि अंतिम चरण में भी किसान टोकन के लिए भटक रहे हैं, धूप में मंडियों के चक्कर काट रहे हैं और उन्हें यह संदेश मिल रहा है कि “अभी धान नहीं लिया जाएगा”, तो डिजिटल और समयबद्ध प्रणाली के दावे खोखले प्रतीत होते हैं। किसी भी नीति की सफलता केवल कुल आंकड़ों से नहीं, बल्कि अंतिम किसान तक उसकी निष्पक्ष पहुंच से मापी जाती है।
विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों को राजनीतिक बयानबाज़ी कहकर खारिज करना आसान हो सकता है, लेकिन वायरल ऑडियो जैसी घटनाएं प्रशासन की जवाबदेही तय करने की मांग करती हैं। यदि वास्तव में किसी अधिकारी ने नियमों के विरुद्ध जाकर खरीदी रोकने या सीमित करने के निर्देश दिए हैं, तो यह केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। वहीं, यदि ऑडियो भ्रामक है, तो सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे त्वरित और स्पष्ट जांच कर सच्चाई सामने रखें, ताकि अफवाहों पर विराम लगे और किसानों का भरोसा बहाल हो।
धान खरीदी जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में सबसे ज़रूरी है भरोसा—किसान का सरकार पर और सरकार का अपनी व्यवस्था पर। पारदर्शिता, स्पष्ट संवाद और जवाबदेही के बिना यह भरोसा नहीं टिक सकता। अंतिम दिन नज़दीक हैं, ऐसे में राज्य सरकार को चाहिए कि वह केवल आंकड़ों के सहारे संतुष्ट न हो, बल्कि ज़मीनी स्तर पर यह सुनिश्चित करे कि कोई भी किसान नियमों के तहत धान बेचने से वंचित न रहे। क्योंकि अंततः धान खरीदी की सफलता का असली पैमाना यही है कि किसान मंडी से खाली हाथ नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसे के साथ लौटे।


