रायपुर/कवर्धा: जितेंद्र पांडे
छत्तीसगढ़ की राजनीति में बीते एक दशक का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि चुनावी परिणाम केवल सरकार विरोधी लहर या संगठनात्मक मजबूती से तय नहीं हुए, बल्कि मोर्चे पर उतारे गए चेहरों ने निर्णायक भूमिका निभाई है। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक गतिविधियाँ और हालिया घटनाक्रम यह संकेत देने लगे हैं कि राज्य एक बार फिर दो मजबूत और परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों की राजनीतिक जंग की ओर बढ़ रहा है।
2018 का विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब कांग्रेस ने भूपेश बघेल को रमन सिंह के विरुद्ध पूरी ताकत से मैदान में उतारा। उस समय भूपेश बघेल न केवल संगठन के भीतर, बल्कि जनमानस में भी अपनी स्वीकार्यता के उच्चतम स्तर पर थे। परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा अपने अब तक के सबसे कमजोर प्रदर्शन तक सिमट गई। यह बदलाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की धुरी का भी था।
इसके ठीक उलट तस्वीर 2023 में देखने को मिली। सत्ता विरोधी माहौल, प्रशासनिक थकान और नेतृत्व के प्रति घटती ऊर्जा ने कांग्रेस को कमजोर किया। भूपेश बघेल का राजनीतिक प्रभाव उस चुनाव में न्यूनतम स्तर पर नजर आया। वहीं भाजपा ने रणनीतिक रूप से आक्रामक मोर्चाबंदी की। यद्यपि मुख्यमंत्री के रूप में विष्णुदेव साय को आगे किया गया, लेकिन चुनावी लड़ाई में भाजपा का वास्तविक चेहरा विजय शर्मा रहे। संगठनात्मक पकड़, निर्णायक बयानबाजी और राजनीतिक आक्रामकता ने उन्हें कांग्रेस के लिए सबसे प्रभावी चुनौती के रूप में स्थापित किया।
वर्तमान परिदृश्य में दिलचस्प संकेत तब मिले, जब अग्रवाल समाज के एक कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वर्तमान उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा एक साथ मंच पर दिखाई दिए। यह दृश्य सामान्य सामाजिक शिष्टाचार से आगे, राजनीतिक संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है। ये दोनों नेता अपने-अपने दलों में न केवल लोकप्रिय हैं, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच चुनावी चेहरा बनने की क्षमता भी रखते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि 2028 में भाजपा और कांग्रेस फिर से इन्हीं दो चेहरों को मोर्चे पर उतार सकती हैं।
यदि ऐसा होता है, तो 2028 का चुनाव केवल नीतियों या घोषणाओं का नहीं, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता, राजनीतिक ऊर्जा और जनसंपर्क की क्षमता की सीधी परीक्षा होगा। सवाल यह नहीं होगा कि किसके पास सत्ता है, बल्कि यह होगा कि कौन जनता को भविष्य की दिशा के लिए अधिक आश्वस्त कर पाता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास बताता है कि जब भी नेतृत्व अपने शिखर पर रहा है, उसने सत्ता का संतुलन बदल दिया है। ऐसे में 2028 की सियासी बिसात पर वही पुराने चेहरे, लेकिन नए हालात और बदली हुई जनता निर्णायक भूमिका निभाएगी।
बने रहें स्वतंत्र छत्तीसगढ़ के साथ…


