रायगढ़/छत्तीसगढ़
हाईलाइट बॉक्स
रायगढ़ में 3 वर्षों में 55 श्रमिकों की मौत, 63 घायल। 2024-25 में 22-22 हादसों में 23-23 मौतें। 3 महीनों में 25 आपराधिक मामले दर्ज। सुरक्षा मानकों में गंभीर चूक और पुराने उपकरण मुख्य कारण।
सुरक्षा में चूक बनी मौतों की सबसे बड़ी वजह
औद्योगिक नगरी रायगढ़ में उद्योगों के भीतर हो रहे लगातार हादसे अब एक गंभीर मानवीय और प्रशासनिक चिंता का रूप ले चुके हैं। औद्योगिक सुरक्षा विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बीते तीन वर्षों में विभिन्न संयंत्रों में 55 श्रमिकों की जान जा चुकी है, जबकि 63 लोग घायल हुए हैं। जिन औद्योगिक इकाइयों में ये दुर्घटनाएँ हुईं, उनमें एनआर इस्पात, रायगढ़ इस्पात, एमएसपी स्टील एंड पावर लिमिटेड, एनआरवीएश स्पंज, जिंदल स्टील एंड पावर, सिंघल स्पंज, बीएस स्पंज प्राइवेट लिमिटेड, नवदुर्गा फ्यूल, शारदा एनर्जी समेत कई बड़े प्लांट शामिल हैं। विभागीय विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश मामलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन न होना, श्रमिकों को आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध न कराना, और उत्पादन लक्ष्य के दबाव में नियमों की अनदेखी हादसों की मूल वजह के रूप में सामने आई है। प्रत्यक्षदर्शी श्रमिकों की आपबीती भी यही बताती है कि तेज़ रफ्तार उत्पादन के बीच सुरक्षा की आवाज़ अक्सर मशीनों के शोर में दब जाती है। दुर्घटनाओं का यह सिलसिला न केवल आंकड़ों में दर्ज मौतें हैं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा भी है जिन्होंने अपने कमाने वाले को खो दिया।
2024 और 2025 में हादसों का ग्राफ सबसे तेज़
विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2023 में 9 औद्योगिक संयंत्रों में हादसे दर्ज किए गए, जिनमें 9 श्रमिकों की मौत हुई और 12 लोग गंभीर व सामान्य रूप से घायल हुए। लेकिन इसके बाद के वर्षों में स्थिति और भयावह होती गई। 2024 में 22 औद्योगिक दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें 23 श्रमिकों की जान चली गई तथा 32 लोग गंभीर व सामान्य चोटों के साथ अस्पताल पहुँचे। 2025 में भी यही आंकड़ा दोहराया गया—22 हादसे और 23 मौतें, जबकि 19 लोग गंभीर व सामान्य रूप से घायल हुए। सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बॉयलर विस्फोट, कन्वेयर बेल्ट में फँसने और भारी मशीनों की चपेट में आने जैसी घटनाएँ सबसे अधिक जानलेवा साबित हुई हैं। औद्योगिक उपकरणों के पुराने हो जाने और उनके नियमित रखरखाव की कमी ने जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। हादसों में जान गंवाने वाले मजदूरों के साथ काम करने वाले साथियों का कहना है कि हर दुर्घटना के बाद जांच होती है, निर्देश भी मिलते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बदलाव की रफ्तार बहुत धीमी है। इन आंकड़ों के पीछे छिपा सच यह भी है कि घायल मजदूरों में कई ऐसे हैं जिनकी काम पर लौटने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो चुकी है, जिससे उनकी आजीविका और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा है।
3 महीनों में 25 उद्योगों पर आपराधिक कार्रवाई
औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग के उप-संचालक राहुल पटेल के मुताबिक, लगातार बढ़ते हादसों को देखते हुए विभाग नियमित निरीक्षण और औचक जांच कर रहा है। जांच में सामने आई गंभीर कमियों के आधार पर बीते तीन महीनों में विभिन्न उद्योगों के खिलाफ 25 आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए हैं। दोषी इकाइयों को नोटिस जारी कर तत्काल सुधार के निर्देश भी दिए गए हैं। उप-संचालक राहुल पटेल ने कहा, “हर मजदूर की सुरक्षा हमारी पहली जिम्मेदारी है। कार्रवाई जारी रहेगी, लेकिन उद्योगों को भी इसे सिर्फ औपचारिकता नहीं, अपनी कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाना होगा।” प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद, यह मुद्दा अब एक सामूहिक जिम्मेदारी की मांग कर रहा है—जहाँ उद्योग प्रबंधन, सुरक्षा अधिकारी और श्रमिक सभी मिलकर सुरक्षा को प्राथमिकता दें, ताकि कोई और परिवार उस पीड़ा से न गुजरे जो रायगढ़ के दर्जनों घर झेल चुके हैं। औद्योगिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा निवेश को खर्च नहीं, बल्कि जीवन बचाने की सबसे अहम पूंजी के रूप में देखा जाना चाहिए।
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