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Friday, February 13, 2026

जंगल की बंदूकों से दीपों की रौशनी तक: आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पहली बार समाज के साथ मनाई आज़ादी की दीपावली…

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छत्तीसगढ़ के बस्तर और गरियाबंद जिलों में इस बार दीपावली का नज़ारा भावनाओं और बदलाव का प्रतीक बन गया। जिन हाथों में कभी हथियार थे, अब वही हाथ मां लक्ष्मी की आरती करते और दीप जलाते दिखे। पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आत्मसमर्पित नक्सलियों ने मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की और आतिशबाजी कर पर्व की खुशियां मनाईं। वर्षों तक जंगलों में रहकर परिवार से दूर रहे इन लोगों ने पहली बार समाज के साथ दीपावली मनाने का अवसर पाया, जिससे उनके चेहरे पर गहरी मुस्कान और सुकून साफ झलक रहा था।
बस्तर में आत्मसमर्पण करने वाले किसकोडो एरिया कमेटी के पूर्व सचिव सोनू हेमला ने कहा कि उन्हें अफसोस है कि उन्होंने जीवन के कई साल गलत रास्ते में बर्बाद कर दिए। उन्होंने बताया कि जंगल में न त्योहार था, न रौशनी—बस बंदूक और डर का साया था। “अब जब समाज के बीच हैं, तो महसूस होता है कि असली खुशी तो इन्हीं दीपों और इन मुस्कुराहटों में है,” सोनू ने कहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही वे अपने परिवार के पास लौटकर उनके साथ त्योहार मनाएंगे और एक नया जीवन शुरू करेंगे।

गरियाबंद जिले में भी नक्सलवाद छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों ने दीपावली का पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया। इनमें 8 लाख रुपए की इनामी पूर्व नक्सली महिलाएं — जानसी, जुनकी, वैजयंती, मंजुला और मैना शामिल थीं। ये वही नाम हैं जिनसे कभी पूरा इलाका दहशत में रहता था। लेकिन इस बार ये महिलाएं गरियाबंद के बाजार में अपनी पहली स्वतंत्र दीपावली के लिए कपड़े और सजावटी सामान खरीदती नजर आईं। उनके चेहरे पर अब आज़ादी, विश्वास और भविष्य की नई रोशनी झलक रही थी।
कांकेर और गरियाबंद के पुलिस अधीक्षक कार्यालयों में प्रशासन ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए विशेष व्यवस्था की थी ताकि वे समाज के साथ मिलकर त्योहार मना सकें। पुलिस अधिकारियों ने न केवल पूजा और आतिशबाजी का आयोजन कराया बल्कि इन लोगों को सम्मान और अपनापन भी दिया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह पहल उन सभी के लिए एक संदेश है जो हिंसा के रास्ते पर चल रहे हैं — कि समाज हमेशा सुधार के लिए दरवाजे खुले रखता है।
जंगलों में हथियार उठाकर जीवन बिताने वाले इन नक्सलियों के लिए यह दीपावली केवल त्यौहार नहीं बल्कि नई शुरुआत थी। उन्होंने कहा कि अब वे अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाकर समाज के विकास में योगदान देना चाहते हैं। यह बदलाव न केवल उनके जीवन को उजागर कर रहा है, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो कभी गलत राह पर भटक गए थे।

“अंधेरे से उजाले की ओर”: बस्तर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में मां लक्ष्मी की पूजा करती आत्मसमर्पित महिला नक्सलियां।

हाइलाइट बॉक्स:

  • 🌟 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने बस्तर और गरियाबंद में पहली बार मनाई दीपावली
  • 🔫 हथियार छोड़ अब दीप जलाकर शांति और प्रेम का संदेश दे रहे हैं
  • 👮‍♂️ पुलिस प्रशासन ने पूजा, प्रसाद और आतिशबाजी की व्यवस्था की
  • 🌸 आठ लाख की इनामी महिला नक्सलियां बनीं समाज में बदलाव की मिसाल
  • 🕯️ “अब हम समाज का हिस्सा बनकर हर त्यौहार मनाएंगे” — पूर्व नक्सली सोनू हेमला

यह दीपावली केवल रोशनी का त्यौहार नहीं रही, बल्कि आत्मसमर्पित नक्सलियों के जीवन में “आज़ादी और अपनापन” की नई शुरुआत लेकर आई। हिंसा के अंधेरे से शांति की रौशनी की ओर बढ़ते इन चेहरों की मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि अगर रास्ता बदलने की इच्छा सच्ची हो, तो हर दीप दिल में उजाला कर सकता है

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