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Thursday, February 12, 2026

क्या अब अदालत में भी टाइप किए हुए बयान चलेंगे? छत्तीसगढ़ कोल स्कैम में EOW पर फर्जी सबूत गढ़ने का गंभीर आरोप…

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रायपुर की स्पेशल कोर्ट में कोल घोटाले के मुख्य आरोपी सूर्यकांत तिवारी की जमानत सुनवाई के दौरान EOW/ACB पर झूठा बयान अदालत में पेश करने का सनसनीखेज आरोप। कोर्ट ने एजेंसी के निदेशक और वरिष्ठ अफसरों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया।

रायपुर: छत्तीसगढ़ कोल स्कैम में नई सनसनी फैलाते हुए रायपुर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने EOW/ACB के निदेशक अमरेश मिश्रा, DSP राहुल शर्मा और ASP चंद्रेश ठाकुर को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि सह-आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान अदालत में दर्ज कराने के बजाय पहले से तैयार टाइप्ड दस्तावेज पेश किया गया।

मामला तब सामने आया जब स्पेशल कोर्ट में सूर्यकांत तिवारी की जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी। तिवारी के वकीलों ने दस्तावेज़ में गड़बड़ियां पाई और इसकी शिकायत हाईकोर्ट में भी की।

शिकायतकर्ता गिरीश देवांगन के अनुसार—

  • प्रस्तुत बयान कोर्ट फॉर्मेट के अनुसार नहीं था।
  • दस्तावेज़ में इस्तेमाल फॉन्ट छत्तीसगढ़ की अदालतों में कभी नहीं होता।
  • यह स्पष्ट संकेत है कि बयान अदालत में दर्ज नहीं बल्कि बाहर टाइप करके पेश किया गया।

देवांगन ने फोरेंसिक जांच करवाई, जिसमें पुष्टि हुई कि दस्तावेज़ न्यायालयीन फॉर्मेट से मेल नहीं खाता। इसके बाद उन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराई और आरोपी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र और अदालत को भ्रमित करने का आरोप लगाया।

कानूनी पहलू:

सीनियर एडवोकेट फैजल रिजवी का कहना है कि यह मामला देश में पहली बार सामने आया, जब कोई जांच एजेंसी अभियुक्त का बयान दर्ज कराने की बजाय अपने कार्यालय से टाइप किया हुआ दस्तावेज़ अदालत में पेश कर रही है।

  • यह अनुच्छेद 21 (न्याय का अधिकार) का उल्लंघन है।
  • न्यायपालिका की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठता है।
  • अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न्यायिक सुधारों के लिए मिसाल बन सकता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया:

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: “क्या अब जांच एजेंसियां झूठे बयान और सबूत खुद बनाने लगी हैं? किसी को फंसाने के लिए सुपारी ली जा रही है? यह देश की न्यायिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर है।” उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से नागरिकों को न्याय मिलने की संभावना कम हो जाती है और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए।

बड़ा सवाल / विश्लेषण:

  • क्या अगर जांच एजेंसियां ही अदालत को गुमराह करने लगीं, तो निष्पक्ष जांच और न्याय कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
  • राज्य की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर सीधे प्रश्न उठते हैं।
  • इस केस से न्यायिक प्रक्रिया में सुधार और फोरेंसिक तकनीक के महत्व को उजागर किया गया।

आगे क्या ?

  • कोर्ट ने EOW/ACB से स्पष्टीकरण और मूल दस्तावेज़ मांगे हैं।
  • CCTV फुटेज और अन्य फोरेंसिक सबूतों की जांच संभव है।
  • यह मामला उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँच सकता है।

छत्तीसगढ़ की न्यायिक प्रक्रिया की इस अनूठी चुनौती ने पूरे राज्य और देश में जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और संविधानिक मर्यादा पर सवाल खड़ा कर दिया है।

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