स्वतंत्र छत्तीसगढ़
जगदलपुर: 02 अक्टूबर 25— छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा दुनियाभर में अपनी अनूठी परंपराओं और भव्य आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। विजयादशमी के दिन जहां पूरे भारत में रावण दहन कर “असत्य पर सत्य की जीत” का संदेश दिया जाता है, वहीं बस्तर में दशहरा का स्वरूप एकदम अलग दिखाई देता है। यहां रावण की प्रतिमा नहीं बनाई जाती और न ही उसका दहन किया जाता है। बल्कि यह पर्व पूरी तरह से मां दंतेश्वरी को समर्पित होता है, जिसमें स्थानीय आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति, गीत-संगीत और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
75 दिनों तक चलता है पर्व:
बस्तर दशहरा केवल एक दिन का नहीं बल्कि पूरे 75 दिनों तक चलने वाला भव्य उत्सव है। इसकी मुख्य रस्म विजयादशमी के दिन निकलने वाली विशाल रथ यात्रा होती है, जिसे रैनी कहा जाता है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु बस्तर पहुंचकर देवी दंतेश्वरी के दर्शन करते हैं और परंपराओं का साक्षी बनते हैं।
600 वर्षों से निभाई जा रही परंपरा:
बस्तर दशहरे की एक विशेष रस्म दंतेश्वरी छत्र से फूल फेंकने की है। इन फूलों को मावली मंदिर परिसर में स्थापित ज्योति कलश में अर्पित किया जाता है। यह परंपरा एरंडवाल गांव के पेगड़ समाज द्वारा पिछले 600 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है। यह परंपरा आज भी स्थानीय आदिवासी समाज की गहरी आस्था और देवी भक्ति को दर्शाती है।
राजपरिवार का विशेष निमंत्रण:
बस्तर दशहरे की परंपराओं में बस्तर राजपरिवार की विशेष भूमिका होती है। शारदीय नवरात्र की पंचमी के दिन राजपरिवार के सदस्य सिंदूर से लिखे आमंत्रण पत्र लेकर मां दंतेश्वरी के दरबार पहुंचते हैं। यहां विधि-विधान से पूजा कर माता को दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया जाता है। इस वर्ष भी बस्तर राजपरिवार ने पूरे परिवार के साथ मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना कर परंपरा का निर्वहन किया।
मावली परघाव की अनूठी रस्म:
बस्तर दशहरे का सबसे आकर्षक और अनूठा आयोजन मावली परघाव की रस्म है, जो आज रात धूमधाम से संपन्न होगी। इस मौके पर माता दंतेश्वरी दंतेवाड़ा से बस्तर पधारेंगी और हजारों की संख्या में जुटे भक्त उनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करेंगे। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार भी विधिवत पूजा कर माता के दर्शन करेंगे।
संस्कृति और आस्था का अद्वितीय संगम:
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह आदिवासी समाज का सामूहिक उत्सव भी है। यहां दशहरे का अर्थ है सामूहिक मिलन, देवी की आराधना और प्रकृति के साथ रिश्तों को और मजबूत करना। यही कारण है कि बस्तर दशहरा भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
यह आयोजन न केवल बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है, बल्कि दुनिया को भारतीय परंपराओं की विविधता और गहराई का संदेश भी देता है।
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