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Saturday, April 11, 2026

जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: क्या ‘कैश कांड’ की गुत्थी सुलझेगी या रहस्य और गहराएगा?

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प्रयागराज /स्वतंत्र छत्तीसगढ़ डेस्क

हाइलाइट बॉक्स:

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद से यशवंत वर्मा का इस्तीफा
  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा त्याग पत्र
  • सरकारी बंगले में आग के बाद जले हुए कैश मिलने से मचा था हड़कंप
  • न्यायपालिका की साख पर उठे गंभीर सवाल

इस्तीफे से फिर गरमाया मामला

लंबे समय से चर्चाओं और विवादों में घिरे जस्टिस यशवंत वर्मा ने आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्याग पत्र राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया। इस घटनाक्रम के बाद न्यायपालिका के गलियारों में एक बार फिर उस रहस्यमयी ‘कैश कांड’ की चर्चा तेज हो गई है, जिसने पूरे सिस्टम को पहले ही झकझोर दिया था।

आग, कैश और उठते सवाल

यह मामला तब सुर्खियों में आया था जब जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने के बाद पुलिस और दमकल टीम को वहां भारी मात्रा में जले हुए कैश मिलने की जानकारी सामने आई। चौंकाने वाली बात यह रही कि उस समय जस्टिस वर्मा शहर में मौजूद नहीं थे, जिससे इस पूरे घटनाक्रम ने कई संदेह और सवाल खड़े कर दिए। यह घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि संभावित बड़े खुलासे की ओर इशारा करती दिखी।

कॉलेजियम की चिंता और साख का सवाल

इस मामले ने न्यायपालिका के शीर्ष स्तर तक चिंता बढ़ा दी थी। संजीव खन्ना की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश की थी। हालांकि, कॉलेजियम के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए—कुछ सदस्यों का मानना था कि सिर्फ तबादला इस गंभीर मामले का समाधान नहीं है और इससे न्यायपालिका की साख पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

पहले भी हुआ था विरोध

गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा को पहले दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट लाया गया था। उस समय भी इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके खिलाफ विरोध जताया था। इतना ही नहीं, उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई थी, जो इस विवाद की गंभीरता को दर्शाता है।

क्या सच सामने आएगा?

अब उनके इस्तीफे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या जले हुए नोटों का सच पूरी तरह सामने आ पाएगा, या फिर इस रहस्य के कुछ अहम हिस्से अब भी अनसुलझे रहेंगे। यह मामला न सिर्फ एक व्यक्ति, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता की कसौटी बन चुका है।

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