नई दिल्ली /भारत
राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश की सांसद सुमित्रा बाल्मीक ने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए 60 वर्ष से अधिक आयु के माता-पिता की देखभाल हेतु 45 दिन की अनिवार्य छुट्टी देने की वकालत की। उन्होंने इसे समय की आवश्यकता बताते हुए “सैंडविच पीढ़ी” की सामाजिक और मानसिक चुनौतियों को रेखांकित किया।
सैंडविच पीढ़ी की मजबूरी पर चिंता
बीते शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए सांसद सुमित्रा बाल्मीक ने कहा कि सरकार महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण के लिए लगातार ऐतिहासिक कदम उठा रही है, लेकिन अब कामकाजी वर्ग की एक और गंभीर समस्या पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने उन लोगों की स्थिति को “सैंडविच पीढ़ी” बताते हुए कहा कि ये लोग एक ओर पेशेवर जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, तो दूसरी ओर वृद्ध माता-पिता की देखभाल का दायित्व भी उठा रहे हैं।
तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी का हवाला
सांसद ने आंकड़े रखते हुए बताया कि 2026 में भारत में युवाओं की संख्या सर्वाधिक होने के बावजूद वरिष्ठ नागरिकों की संख्या 14.9 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो 2036 तक 23 करोड़ से ऊपर पहुंच जाएगी। उन्होंने चेताया कि आने वाले समय में हर तीसरा भारतीय बुजुर्ग होगा। ऐसे में बुजुर्ग-केन्द्रित नीतियों की जरूरत और भी बढ़ जाती है।
छुट्टी को मानवीय अधिकार बताया
सुमित्रा बाल्मीक ने कहा कि शहरीकरण और रोजगार के कारण लाखों युवा अपने माता-पिता से दूर रहने को मजबूर हैं। जब घर में बुजुर्गों को चिकित्सा या भावनात्मक देखभाल की आवश्यकता होती है, तब बेटे या बेटी की मौजूदगी बेहद जरूरी होती है, लेकिन कार्यालय से छुट्टी मिलना बड़ी चुनौती बन जाता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में 60 वर्ष से अधिक आयु के माता-पिता की देखभाल के लिए 45 दिन की अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान किया जाए। सांसद ने कहा, “जिस तरह एक मां अपने बच्चे को वर्षों समर्पित करती है, उसी तरह बीमार माता-पिता की सेवा के लिए संतान को भी समय मिलना चाहिए।”
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