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Wednesday, February 11, 2026

हाईकोर्ट का अहम फैसला: केवल जाति का नाम लेना SC/ST एक्ट का अपराध नहीं, मंशा और सार्वजनिक अपमान साबित होना जरूरी…

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बिलासपुर/छत्तीसगढ़

हाइलाइट :
• 16 साल पुराने मामले में सत्र न्यायालय की सजा निरस्त
• सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमान की नीयत सिद्ध न होने पर राहत
• स्वतंत्र गवाहों के hostile होने को माना गया महत्वपूर्ण
• आरोपी मनोज पांडे दोषमुक्त

न्यायिक व्याख्या और निर्णय की पृष्ठभूमि:
बिलासपुर हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना अपने-आप में अपराध नहीं बनता। अपराध तभी बनता है जब यह सिद्ध हो कि जातिसूचक शब्द सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमानित या अपदस्थ करने की नीयत से कहे गए हों। न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने 16 साल पुराने प्रकरण में सत्र न्यायालय द्वारा दी गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

मामले के तथ्य और ट्रायल कोर्ट का फैसला:
मामला 3 सितंबर 2008 का है, जब पथरिया स्थित छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल सब-स्टेशन में पदस्थ जूनियर इंजीनियर उत्तरा कुमार धृतलहरे ने शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि दुर्गा पूजा के लिए 1000 रुपये चंदा देने से इनकार करने पर मनोज पांडे ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। पुलिस जांच के बाद सत्र न्यायालय ने 28 अगस्त 2010 को मनोज पांडे को एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(10) के तहत दोषी ठहराया, जबकि सह-आरोपी कृष्णा साहू को बरी कर दिया गया।

हाईकोर्ट की टिप्पणी और अंतिम निष्कर्ष:
अपील में तर्क दिया गया कि सभी स्वतंत्र गवाह अभियोजन के पक्ष में नहीं आए और उन्हें hostile घोषित किया गया। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि कथित शब्द सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमान या भय पैदा करने की नीयत से कहे गए थे। साथ ही, जब आईपीसी की धाराओं 451, 384, 294 और 506 से आरोपी पहले ही बरी हो चुका था, तब केवल एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं मानी जा सकती। परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।

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