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Saturday, February 14, 2026

पारंपरिक चिकित्सा हमारी सांस्कृतिक पहचान और जनसेवा की धरोहर है : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आज छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय परंपरागत वैद्य सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।

सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए सैकड़ों पारंपरिक वैद्यों ने मुख्यमंत्री का स्वागत औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों से बनी माला पहनाकर किया। मुख्यमंत्री श्री साय ने इस अवसर पर आयोजित औषधीय पौधों की प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया और राज्य में पारंपरिक चिकित्सा की विरासत को संजोने वाले वैद्यों की सराहना की।

वैद्यों के लिए पंजीकरण और प्रशिक्षण की योजना

मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार सभी पंजीकृत वैद्यों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें अधिकृत पंजीयन प्रमाणपत्र उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा कि इससे पारंपरिक चिकित्सकों को सरकारी मान्यता मिलने के साथ-साथ दस्तावेज़ों के अभाव में आने वाली समस्याओं से भी मुक्ति मिलेगी।

उन्होंने कहा, “पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली हमारी सांस्कृतिक पहचान और जनसेवा की धरोहर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इन परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता दी है, जो हमारे लिए गर्व की बात है।”

छत्तीसगढ़ : एक उभरता ‘हर्बल स्टेट’

मुख्यमंत्री साय ने बताया कि छत्तीसगढ़ को पूरे देश में हर्बल स्टेट के रूप में पहचान मिल चुकी है। राज्य में डेढ़ हजार से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र के जामगांव में औषधीय पौधों से अर्क निकालने के लिए एक आधुनिक संयंत्र (फैक्ट्री) स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्राकृतिक चिकित्सा को नई ऊर्जा मिली है। इसी दिशा में पृथक आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई, जिससे परंपरागत चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली है।

स्थानीय वैद्यों को रोजगार से जोड़ने की पहल

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार क्लस्टर-आधारित मॉडल के माध्यम से स्थानीय जड़ी-बूटियों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित कर रही है। इस पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में वैद्यों को स्थायी रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही, औषधीय पौधों और वृक्षों के संरक्षण के लिए भी ठोस प्रयास जारी हैं।

वैद्य परंपरा : भारत की प्राचीन चिकित्सा ज्ञानधारा

मुख्यमंत्री ने पद्मश्री सम्मानित श्री हेमचंद मांझी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका कार्य भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा की जीवंत मिसाल है। उन्होंने बताया कि श्री मांझी के उपचार की ख्याति अमेरिका तक पहुंची है। यह छत्तीसगढ़ और देश के लिए गौरव की बात है कि हमारे वैद्यजन अपने पारंपरिक ज्ञान से गंभीर बीमारियों का उपचार कर रहे हैं।

अन्य वक्ताओं के विचार

कार्यक्रम में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री रामविचार नेताम ने वैद्यों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि “वैद्य समाज के सच्चे स्वास्थ्य प्रहरी हैं। वे न केवल मानव स्वास्थ्य बल्कि पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दे रहे हैं।”
उन्होंने पद्मश्री हेमचंद मांझी की तुलना रामायण काल के सुषेन वैद्य से की।

छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने बताया कि सम्मेलन में 1300 से अधिक वैद्यों का पंजीयन किया गया है। बोर्ड द्वारा शुरू की जा रही ‘नवरत्न योजना’ के तहत प्रदेशभर में हर्रा, बहेड़ा, आंवला, मुनगा जैसे औषधीय पौधों का रोपण किया जाएगा।

पद्मश्री श्री मांझी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सही जानकारी और औषधियों के संयोजन से वैद्यजन कई गंभीर रोगों, यहाँ तक कि कैंसर जैसी बीमारियों का भी सफल उपचार कर सकते हैं।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री व्ही. श्रीनिवास राव ने कहा कि जिन क्षेत्रों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ नहीं पहुंच पातीं, वहां पारंपरिक वैद्य ही लोगों की जीवनरेखा हैं।

सम्मेलन में विशेष पहलें और सम्मान

सम्मेलन में प्रदेशभर से आए वैद्यों ने अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठा और गोपनीयता की शपथ ली। मुख्यमंत्री द्वारा 25 वैद्यों को कच्ची औषधीय पिसाई मशीनें प्रदान की गईं।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा प्रकाशित डॉ. देवयानी शर्मा की पुस्तक का भी विमोचन हुआ, जिसमें दुर्ग वन वृत्त के पारंपरिक वैद्यों द्वारा संरक्षित उपचार पद्धतियों और औषधीय पौधों का विस्तृत संकलन है।

कार्यक्रम में बोर्ड के सीईओ श्री जे. ए. सी. एस. राव, जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष श्री राकेश चतुर्वेदी, आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति श्री प्रदीप कुमार पात्रा सहित प्रदेशभर के वैद्य और गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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