भूषण /स्वतंत्र छत्तीसगढ़
रायपुर: 27 सितम्बर 2025 — महज 100 रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में फंसे रायपुर के लिली चौक निवासी 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया को आखिरकार 39 साल बाद न्याय मिला। हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। 24 अक्टूबर 1986 की घटना के अनुसार, वे मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम में बिल सहायक पद पर तैनात थे। कर्मचारी अशोक कुमार वर्मा ने बिल पास कराने का दबाव डाला। जागेश्वर ने इनकार किया, जिसके अगले दिन वही कर्मचारी उनके पास 100 रुपए का नोट डालकर आया। विजिलेंस टीम तुरंत पहुंची और मामला दर्ज कर लिया गया।
जांच के दौरान उनके घर से सिर्फ घड़ी, साइकिल और बच्चों की किताबें मिलीं। बावजूद इसके निचली अदालत ने 2004 में उन्हें दोषी ठहराया। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की, जिसका फैसला आने में पूरे 21 साल लगे। 2025 में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इस लंबी कानूनी लड़ाई ने उनके परिवार और जीवन को तहस-नहस कर दिया। उनकी पत्नी का निधन हो गया, बेटियां शादी के बाद ससुराल चली गईं, और बड़ा बेटा बाहर रोजगार के लिए गया।
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आज जागेश्वर अपने छोटे बेटे नीरज के साथ उसी पुराने घर में रहते हैं। उन्होंने कहा, “अब मुझे न्याय के अलावा कुछ नहीं चाहिए। बस मेरा बकाया पैसा और उम्र देखते हुए थोड़ी मदद दी जाए।” इस मामले ने न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार और इंसान पर उसके प्रभाव को स्पष्ट कर दिया। महज 100 रुपए का आरोप 39 साल तक एक परिवार की जिंदगी को प्रभावित करता रहा, और आखिरकार अदालत ने साफ कर दिया कि जागेश्वर निर्दोष थे।
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