स्वतंत्र छत्तीसगढ़
रायपुर, 22 सितम्बर 2025 —हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर ने “उभरती न्यायशास्त्र दृष्टि: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का सामाजिक-वैधानिक प्रभाव” विषय पर एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन सम्मेलन का सफल आयोजन किया। सम्मेलन का उद्घाटन माननीय न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, उड़ीसा उच्च न्यायालय ने किया। उन्होंने कहा कि राज्य और निजी कंपनियाँ आवश्यकता से अधिक डेटा संग्रह कर रही हैं, जिससे “डेटा प्राइवेसी” एक मिथक बन गई है। कुलपति प्रो. वी.सी. विवेकानंदन ने एआई को “जिन्न की बोतल से बाहर” बताते हुए प्रभावी कानूनी ढाँचे की जरूरत पर बल दिया।
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने एआई के नैतिक, सामाजिक और कानूनी पहलुओं पर गहन चर्चा की। पैनल सत्र में श्री कश्यप कोम्पेला ने वैश्विक सहमति की कमी को रेखांकित किया, डॉ. ऋषिराज भारद्वाज ने भारत की धीमी प्रगति पर चिंता जताई, जबकि डॉ. भावना महादेव ने डेटा-आधारित एआई से सामाजिक बहिष्करण के खतरे की ओर इशारा किया। प्रो. (डॉ.) होंग ज़ुए ने कहा कि बौद्धिक संपदा में मानवीय रचनात्मकता ही मूल धारा रहनी चाहिए। सम्मेलन के आठ तकनीकी सत्रों में 60 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
समापन सत्र में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री एन. एस. नप्पिनाई ने भारत के डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट की खामियों पर प्रकाश डाला और कहा – “प्राइवेसी इज़ नॉट अबाउट सीक्रेसी, बट अबाउट चॉइस।” कुलपति प्रो. विवेकानंदन ने चेताया कि एआई की अपारदर्शिता और अनियंत्रित प्रयोग पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो यह मानवाधिकारों को कमजोर कर सकता है। आयोजन में शिक्षकों के साथ छात्र समिति ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
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