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Monday, May 25, 2026

रायपुर गोलीकांड में बड़ा फैसला: 13 साल बाद वीरेंद्र सिंह तोमर बरी, सबूतों की कमी बनी वजह…

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रायपुर / स्वतंत्र छत्तीसगढ़ डेस्क

मुख्य बातें
  • 2013 के बहुचर्चित रायपुर गोलीकांड मामले में कोर्ट का फैसला
  • प्रथम अपर सेशन जज नीरज शर्मा ने सुनाया निर्णय
  • वीरेंद्र सिंह तोमर सभी आरोपों से दोषमुक्त घोषित
  • अभियोजन पक्ष पर्याप्त सबूत पेश करने में रहा विफल

मामला क्या था?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वर्ष 2013 में हुए एक विवादित गोलीकांड ने उस समय काफी सुर्खियां बटोरी थीं। फर्नीचर कारोबारी मोहम्मद हबीब खान को वीरेंद्र सिंह तोमर ने अपनी बहन की शादी के लिए 48 हजार रुपये का ऑर्डर दिया था, जिसमें 5 हजार रुपये एडवांस दिए गए थे। बाकी 43 हजार रुपये को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद गहराता गया। 13 अगस्त 2013 को जब हबीब खान अपने साथियों के साथ सामान वापस लेने पहुंचे, तो बहस शुरू हुई जो जल्द ही झड़प में बदल गई।

कैसे हुई घटना और क्या थे आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, विवाद के दौरान वीरेंद्र सिंह तोमर कथित रूप से पिस्टल लेकर पहुंचे और हबीब खान पर गोली चलाई। हालांकि, हबीब बच गए लेकिन उनके पीछे खड़े नौसाद आलम उर्फ असलम को गोली लग गई, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की, घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए गए और गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पुलिस ने घटना में इस्तेमाल पिस्टल भी बरामद कर ली थी।

कोर्ट ने क्यों किया बरी?

मामले की सुनवाई के दौरान प्रथम अपर सेशन न्यायाधीश नीरज शर्मा ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त और ठोस नहीं हैं। अदालत ने पाया कि उपलब्ध गवाहों और सबूतों के आधार पर आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो सके। इसी आधार पर वीरेंद्र सिंह तोमर उर्फ रूबी सिंह को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया।

बचाव पक्ष की दलील

बचाव पक्ष के अधिवक्ता शशांक मिश्रा ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को गंभीरता से सुना और सभी तथ्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट पाया कि केस में पर्याप्त प्रमाण नहीं थे, जिसके चलते यह फैसला सुनाया गया।

फैसले का व्यापक असर

यह फैसला न्याय प्रणाली में “संदेह का लाभ” (Benefit of Doubt) के सिद्धांत को एक बार फिर रेखांकित करता है। यह भी दर्शाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में मजबूत और पुख्ता सबूत कितने जरूरी होते हैं। 13 साल बाद आए इस फैसले ने न केवल आरोपी को राहत दी, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता और साक्ष्य-आधारित निर्णय की अहमियत को भी सामने रखा।

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