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Monday, May 25, 2026

लाल किला मैदान में जुटा जनजातीय महा समागम, डी-लिस्टिंग कानून की मांग पर मुखर हुए आदिवासी समाज…

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नई दिल्ली / भारत

बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, धर्मांतरण और एसटी अधिकारों पर उठी बड़ी मांग |

हेडलाइंस

  • दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित हुआ जनजातीय महा समागम
  • मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कार्यक्रम में की सहभागिता
  • धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को एसटी सूची से बाहर करने की मांग
  • डी-लिस्टिंग कानून लागू करने को लेकर उठी आवाज
  • देशभर से पहुंचे हजारों आदिवासी समाज के प्रतिनिधि

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजातीय महा समागम में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय शामिल हुए। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जनजातीय सुरक्षा मंच के बैनर तले आयोजित इस विशाल सम्मेलन में देशभर से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचे। कार्यक्रम के दौरान धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति श्रेणी से बाहर करने तथा डी-लिस्टिंग कानून लागू करने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई।

जनजातीय संस्कृति और पहचान बचाने का आह्वान

मीडिया से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह सौभाग्य की बात है कि देशभर के जनजातीय समाज के लोग राजधानी दिल्ली में एकत्रित हुए हैं। उन्होंने कहा कि देश में जनजातीय समाज की आबादी 12 करोड़ से अधिक है और सभी लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान को बचाने के उद्देश्य से एकजुट हुए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनजातीय समाज अपने रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है।

धर्मांतरण को लेकर जताई चिंता

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विधर्मी तत्वों द्वारा जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अब यह स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि उनकी संस्कृति और सामाजिक परंपराओं के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने डी-लिस्टिंग कानून को देश में लागू किए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

क्या है डी-लिस्टिंग की मांग?

जनजातीय संगठनों का कहना है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं तथा सामाजिक व्यवस्था से अलग हो गए हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर किया जाना चाहिए। संगठनों का तर्क है कि संविधान में आदिवासी समाज को दिया गया आरक्षण और विशेष संरक्षण उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान तथा पारंपरिक जीवनशैली की रक्षा के उद्देश्य से था। उनका आरोप है कि बीते वर्षों में मिशनरी गतिविधियों के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है।

देशभर से पहुंचे जनजातीय समाज के लोग

इस महा समागम में गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों सहित देशभर से आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हुए। कई स्थानों से पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ रैलियां निकालकर लोगों को दिल्ली रवाना किया गया। आयोजन से जुड़े लोगों का दावा है कि यह हाल के वर्षों का सबसे बड़ा आदिवासी शक्ति प्रदर्शन साबित हो सकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ सकती है बहस

डी-लिस्टिंग कानून और धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर यह सम्मेलन अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा जनजातीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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