बिलासपुर / छत्तीसगढ़
मुख्य बिंदु
- करीब 20 साल पुराने मामले में आरोपी को राहत
- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम निर्णय
- रिश्वत मांग और स्वीकार साबित न होने पर बरी
- केवल रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं: कोर्ट
2004 की ट्रैप कार्रवाई से शुरू हुआ विवाद
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वर्ष 2004 के चर्चित रिश्वत मामले में आरोपी को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने सीबीआई कोर्ट, रायपुर द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांग और स्वीकार दोनों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। यह मामला कोरिया कोलियरी (एसईसीएल) के कर्मचारी माइकल मसीह की शिकायत पर आधारित था, जिसमें तत्कालीन पर्सनल मैनेजर जितेंद्र नाथ मुखर्जी पर 5,000 रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था।
साक्ष्यों में खामियां: सिर्फ शिकायतकर्ता के बयान पर टिका मामला
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि रिश्वत मांग की पुष्टि केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित थी, जिसे स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्यों से पुष्ट नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि सिर्फ पैसे की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता। साथ ही, जिस सीपीएफ आवेदन के आधार पर रिश्वत मांगने का आरोप था, उसका मूल दस्तावेज पेश नहीं किया गया। गवाहों के बयान भी आपस में मेल नहीं खाते थे और ट्रैप गवाहों ने केवल पैसे मिलने की पुष्टि की, मांग की नहीं।
आरोपी का बचाव और अदालत की राय
आरोपी ने अपने बचाव में कहा कि उसने रिश्वत नहीं मांगी थी और शिकायतकर्ता ने जबरन पैसे देने की कोशिश की थी। कोर्ट ने माना कि यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन की कहानी को मजबूत नहीं करते। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में “डिमांड” और “एक्सेप्टेंस” दोनों का प्रमाण आवश्यक है, केवल पैसे मिलना पर्याप्त नहीं है।
अंतिम फैसला: दोषसिद्धि और सजा पूरी तरह निरस्त
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा, इसलिए आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया गया। चूंकि आरोपी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी थी, उनकी पत्नी ने कानूनी प्रतिनिधि के रूप में अपील जारी रखी थी। अदालत ने सभी आरोपों से आरोपी को बरी करते हुए मामले में आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं बताई।
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