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दंतेवाड़ा में महाशिवरात्रि: मां दंतेश्वरी मंदिर में आधी रात हुआ दिव्य विवाह उत्सव, सात विशेष पूजाओं से गूंजा बस्तर…

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दंतेवाड़ा / छत्तीसगढ़

हाइलाइट्स:
• आधी रात को परंपरागत रीति से महाशिवरात्रि का आयोजन
• मां दंतेश्वरी की सात बार विशेष पूजा और सात भोग
• 35 गांवों की सहभागिता, बैगा-सिरहा की परंपरागत परीक्षा
• भगवान शिव–माता पार्वती के दिव्य विवाह का मंचन

अनोखी परंपराओं के साथ जागा बस्तर

दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जीवंत सांस्कृतिक आस्था का उत्सव है। आधी रात को मां दंतेश्वरी मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक अनुष्ठानों के बीच पर्व की शुरुआत हुई। मंदिर के पुजारी विजेंद्र नाथ के अनुसार, “शिवरात्रि विश्वभर में मनाई जाती है, लेकिन बस्तर की परंपराएं इसे विशिष्ट बनाती हैं।” गर्भगृह में रुद्रावतार भैरव रूप में भगवान शिव की स्थापना है और यहां सात से आठ दिनों तक रात्रि जागरण, साधना और विशेष पूजा-अर्चना चलती है। बैगा और सिरहा अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करते हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय और ऊर्जावान बना रहता है।

सात पूजाएं, सात भोग और पांच पांडव मंदिर की परंपरा

शिवरात्रि की पूर्व संध्या से आरंभ हुए अनुष्ठान प्रातः 4 बजे तक जारी रहते हैं। इस दौरान मां दंतेश्वरी की सात बार विधि-विधान से पूजा और सात प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद प्रधान पुजारी को सम्मानपूर्वक पांच पांडव मंदिर ले जाया जाता है, जहां आसपास के समलूर, तीरथगढ़, चित्रकोट और आरूर सहित विभिन्न देवस्थानों से देवी-देवताओं का आगमन होता है। 35 गांवों के श्रद्धालु इस आयोजन में सहभागी बनते हैं। रस्सी के ‘मुंद्रा’ को मां के चरणों में अर्पित कर बैगा-सिरहा द्वारा उसे प्रसाद स्वरूप स्वीकार करना सदियों पुरानी आस्था और तपस्या की अनूठी मिसाल है। शक्तिपीठ होने के कारण यहां तंत्र-साधना और विशेष क्रियाएं भी संपन्न होती हैं।

दिव्य विवाह और नई पीढ़ी की परंपरागत परीक्षा

मध्यरात्रि में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के दिव्य विवाह का पारंपरिक मंचन किया जाता है। गीत-संगीत और जनजातीय नृत्य के बीच पांच पांडव मंदिर परिसर उत्सव में डूब जाता है। इस अवसर पर नए बैगा और सिरहा की परीक्षा भी ली जाती है; जो सफल होते हैं, उन्हें समुदाय में विधिवत सम्मिलित किया जाता है। विवाह की सभी रस्में निभाई जाती हैं, जिससे यह आयोजन धार्मिक के साथ-साथ सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन जाता है। अगले दिन महाशिवरात्रि का पर्व पूरे विश्व में मनाया जाता है, किंतु दंतेवाड़ा की यह रात बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को विशेष गरिमा प्रदान करती है।

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