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Wednesday, February 11, 2026

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला, बिना पुख्ता सबूत जीवनसाथी पर अफेयर का आरोप मानसिक क्रूरता, डॉक्टर पति को तलाक मंजूर…

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिना ठोस सबूत के पति या पत्नी पर अवैध संबंधों का आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने डॉक्टर पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए पत्नी के आरोपों को निराधार माना और एकमुश्त 25 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

चरित्र शंका को बताया क्रूरता का गंभीर रूप

जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि एक शिक्षित पत्नी द्वारा पति पर बिना आधार चरित्र हनन जैसे गंभीर आरोप लगाना वैवाहिक जीवन को असहनीय बना देता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे आरोप न केवल सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि गहरी मानसिक पीड़ा भी देते हैं। इस मामले में पत्नी अपने आरोपों को साबित करने में पूरी तरह असफल रही, जिसे कोर्ट ने पति के प्रति मानसिक क्रूरता माना।

क्या है पूरा मामला, कैसे टूटा रिश्ता

सारंगढ़ निवासी डॉक्टर की शादी वर्ष 2008 में भिलाई की महिला डॉक्टर से रायगढ़ में हुई थी। शादी के बाद एक बेटी का जन्म हुआ, लेकिन कुछ वर्षों में रिश्तों में तनाव बढ़ता चला गया और वर्ष 2014 से दोनों अलग रहने लगे। पति का आरोप था कि पत्नी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी, सिंदूर लगाने और मंगलसूत्र पहनने से इनकार करती थी, यहां तक कि उस पर जानलेवा हमला भी किया गया। पत्नी की ओर से अवैध संबंधों के आरोप और बार-बार मानसिक प्रताड़ना के कारण वैवाहिक जीवन टूटने की कगार पर पहुंच गया।

फैमिली कोर्ट से हाई कोर्ट तक का सफर

डॉक्टर पति ने पहले दुर्ग फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने लिखित बयान में पति पर किसी अन्य महिला डॉक्टर से संबंध होने का आरोप लगाया और घर में जबरन घुसकर तोड़फोड़ का दावा किया, लेकिन इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। कोर्ट ने माना कि भले ही कुछ समय पहले दोनों साथ में फिल्म देखने गए हों, लेकिन लगातार लगाए गए निराधार आरोप मानसिक क्रूरता के स्पष्ट प्रमाण हैं। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने तलाक मंजूर करते हुए पति को छह माह के भीतर पत्नी को 25 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया, ताकि बेटी के भविष्य और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचा जा सके।

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