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दलितों पर हमलों के लिए संघ, भाजपा जिम्मेवार..

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रायपुर : 15 मार्च 2023 (रवीश बेंजामिन )

देश भर में राज्य राजधानियों में हुआ प्रदर्शन

जब से केंद्र और कई राज्यों में भाजपा की नेतृत्व वाली सरकारें सत्ता में आईं हैं,उनके द्वारा अपनाई जा रही कारपोरेट परस्त और साम्प्रदायिक नीतियों के कारण दलित अधिकारों और आजीविका पर लगातार हमले बढ़े हैं। भाजपा सरकार नवउदारवादी नीतियों को लागू करने,सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और सार्वजनिक संपत्ति को बेचने, शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्रों के निजीकरण  को आगे बढ़ाने और मजदूर वर्ग, किसानों ,दलितों,आदिवासियों,अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों पर निर्दयता से हमला करने में निरंतर आगे बढ़ रही है । दलित शोषण मुक्ति मंच के आव्हान पर 14 मार्च को देश भर में राज्यों की राजधानियों में प्रदर्शन के आव्हान के तहत रायपुर में अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष रायपुर में हुए प्रदर्शन को संबोधित करते हुए दलित शोषण मुक्ति मंच के राज्य संयोजक वकील भारती, रतन गोंडाने, शेखर नाग, अखिलेश एडगर, माकपा नेता धर्मराज महापात्र, पवन सक्सेना, निसार अली, रवि बौद्ध, शशांक ढाबरे, रघुनंदन साहू, भंजन जांगड़े, डॉ नरेश साहू, सुमन घृतलहरे, गणेश सोनकर, अजय कन्नौजे, मारुति डोंगरे, अनिल कोरी, नंदा रामटेके, राजकुमार रामटेके, सुमन घृतलहरे,बीमा कर्मी नेता सुरेंद्र शर्मा, के के साहू, संदीप सोनी, गजेंद्र पटेल, दुर्गा बघेल ने कही।
वक्ताओं ने कहा कि इन नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया है ,जिसमें अल्पसंख्यकों को कई तरह से निशाना बनाया जा रहा है ।यह बड़ी ही बेशर्मी से नफरत और कट्टरता की राजनीति को बढ़ावा देती है । रिकार्ड बताते हैं कि 2014में केंद्र व कई राज्यों में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से दलितों के खिलाफ अपराध बढ़े हैं।दलितों के खिलाफ हिंसा के मामले2011के 33,719से बढ़कर 2020 में 50,291हो गए । 2017-2018 के बीच दलितों के खिलाफ अपराध में 27.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं आदिवासियों के खिलाफ 20.3प्रतिशत की वृद्धि हुई ।भाजपा शासित राज्यों में दलितों के खिलाफ अत्याचार सबसे अधिक दर्ज हुए हैं राजस्थान और आंध्रप्रदेश को छोड़कर।पिछले 10 साल के अंदर यूपी में 95,791,बिहार में 63,116,राजस्थान में 58,945,एम पी में 44,469और आंध्रप्रदेश में 26,881रिपोर्ट दर्ज हुए हैं।इसके बावजूद ,2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कहा गया है पीओए अधिनियम निर्दोष नागरिकों और लोकसेवकों को “ब्लैकमेल”करने का एक साधन बन गया है। ढेर सारे सबूतों के बावजूद इस अधिनियम का इस्तेमाल कठोरता से नहीं करने के कारण इसे अप्रभावी बना दिया गया है । इस फैसले से दलितों में गुस्से की लहर दौड़ गई और स्वतः स्फूर्त तरीके से गुस्से का इजहार करने के लिए 2 अप्रैल को सफल “भारत बंद” किया गया ।इस भारत बंद के खिलाफ उच्च जातियों के अपराधियों ने दलितों को भयानक रूप से हिंसा का शिकार बनाया।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (जिसे बाद में संसद के एक अधिनियम के द्वारा संशोधित किया गया ।)का विरोध करने वालों पर निर्मम हमले भाजपा के घृणित मनुवादी चेहरे का पर्दाफाश करते नजर आते हैं ।
इसी तरह पिछले पांच वर्षों में सफाई के दौरान कम से कम 347 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई है ।जिसमें सबसे ज्यादा मौतें यूपी में हुई । वक्ताओं ने दलितों को उचित रोजगार से वंचित किया जाता है ।जबकि कुछ को तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की नौकरियां मिलती है ,सरकार के उच्च श्रेणियों में केवल 4 प्रतिशत  नौकरियां ही दलितों को मिल पाती है ।अब मोदी सरकार के निजीकरण और मुद्रीकरण की नीति के कारण सुरक्षित नौकरियों के दरवाजा पूरी तरह से बंद हो गया है ।दलितों में बेरोजगारी 2017-18में 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में6.4प्रतिशत हो गई है ।
दलित महिलाओं के खिलाफ 2015 से 2020 के बीच बलात्कार की घटनाओं में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है ।भारत में औसतन 10 दलित महिलाओं के साथ रोजाना बलात्कार की घटनाएं होती हैं ।कई मामलों में तो बलात्कार पीड़ितों की अपराधियों द्वारा हत्या तक कर दी जाती है । 2020में हुए उत्तरप्रदेश के कुख्यात हाथरस कांड इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसमें 4उच्च जाति के पुरुषों ने एक युवा बाल्मीक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया था।शारीरिक चोट के कारण पीड़िता की बाद में मौत हो गई थी और पुलिस ने युवती का  शव उनके परिवार से छीन लिया और आधी रात को उस पर पेट्रोल डालकर जला दिया था ।उनके 4 अभियुक्तों में से 3 को कोर्ट ने अपराधमुक्त कर दिया है ।

वक्ताओं ने कहा कि दलित बच्चों को शिक्षण संस्थानों में भयानक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है ।सरकार के प्राथमिक विद्यालयों में दलित बच्चों को अलग खाना परोसा जाता है ।कई जगहों पर तो उन्हें शौचालय साफ करने और फर्श पर झाड़ू लगाने को मजबूर किया जाता है और शिक्षक अक्सर  उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं ।यहां तक कि आई आई टी ,मेडिकल कालेज और विश्वविद्यालयों में भी दलित छात्रों को भेदभाव व बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और कई तो इससे तंग आकर आत्म हत्या भी कर लेते हैं । 2016 में हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्मा हत्या और बम्बई आईआईटी में अभी इसी साल दर्शन सोलंकी की आत्महत्या इसका ज्वलंत उदाहरण है ।केंद्र सरकार द्वारा संचालित आई आई टी ,एन आई टी और केंद्रीय संस्थानों में 2014 से 2021 के बीच 122 छात्रों ने आत्महत्या की उनमें से 24 छात्र दलित थे ।
केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति का पूरा ध्यान शिक्षा के निजीकरण पर है और पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों के सैकड़ों सरकारी स्कूलों को बंद या विलय किया जा रहा है ,इससे दलित छात्रों को भारी तादाद में शिक्षा से वंचित होना पड़ रहा है।इसी तरह से सार्वजनिक क्षेत्रों का तेजी से निजीकरण करने से दलितों,आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लोगों  के लिए आरक्षण अब मिथक बन गया है। वक्ताओं ने दलितों के उक्त समस्याओं ,उनके उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ निम्नलिखित मांगों को लेकर सभी लोकतांत्रिक,प्रगतिशील ताकतों ,संगठनों ,समूह और व्यक्ति तथा दलितों और समाज के अन्य उत्पीड़ित तबकों के सशक्तिकरण के लिए काम करने वाले सभी लोगों को भाजपा सरकार के मनुवादी ,नवउदारवादी और सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए एक साथ आने की अपील की । इसी तरह का विरोध प्रदर्शन सरगुजा में भी किया गया और जिलाधीश को ज्ञापन सौंपा गया। इस प्रदर्शन की अगुआई बाल सिंह, सुरेंद्र लाल सिंह तथा किमलेश ने की।

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