रायपुर/छत्तीसगढ़
हाईलाइट बॉक्स:
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में कर्नाटक के सिद्दी समुदाय के 4 पहलवानों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 3 ने स्वर्ण और 1 ने रजत पदक जीता। यह उपलब्धि न सिर्फ व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि पूरे समुदाय के खेल जगत में उभरते प्रभाव और बदलती सोच का प्रतीक बन गई है।
प्रतिभा को मिला मंच, इतिहास रच गया समुदाय
“प्रतिभा को किसी परिचय की जरूरत नहीं होती” — यह कहावत खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में पूरी तरह चरितार्थ हुई, जब कर्नाटक के सिद्दी समुदाय के पहलवानों ने कुश्ती मैट पर अपनी जबरदस्त मौजूदगी दर्ज कराई। अफ्रीकी मूल के इस समुदाय के लगभग 50 हजार लोग भारत में रहते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या कर्नाटक में है। इस बार 9 पहलवानों की टीम में 4 सिद्दी खिलाड़ियों का चयन हुआ और इन चारों ने अपने प्रदर्शन से सभी का ध्यान खींच लिया। मनीषा जुआवा सिद्दी, रोहन एम डोड़ामणि और प्रिंसिता पेदरू फर्नांडिस ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा, जबकि शालिना सेयर सिद्दी ने रजत पदक हासिल किया।
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संघर्ष, मेहनत और बदलती सोच की कहानी
इन खिलाड़ियों की सफलता सिर्फ पदकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके संघर्ष, अनुशासन और बदलती सामाजिक सोच की कहानी भी कहती है। धारवाड़ जिले के रोहन डोड़ामणि, जिनके पिता का देहांत हो चुका है और मां स्कूल में काम करती हैं, ने बताया कि समुदाय में छोटे-छोटे दंगल युवाओं को प्रेरित करते हैं। वहीं शालिना और प्रिंसिता जैसी खिलाड़ी यह दर्शाती हैं कि अब सिद्दी समुदाय की बेटियां भी खेलों में आगे बढ़ रही हैं। प्रिंसिता ने कहा, “शुरुआत में कुश्ती पसंद नहीं थी, लेकिन अब यही मेरा सपना बन गया है।” उनकी रोजाना की कड़ी मेहनत इस बदलाव का प्रमाण है।
सरकार की पहल और भविष्य की उम्मीदें
दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में ट्रायल में शीर्ष स्थान हासिल करने के बाद इन खिलाड़ियों ने प्रतियोगिता में भी शानदार प्रदर्शन किया। कर्नाटक टीम की कोच ममता ने बताया कि राज्य में सिद्दी समुदाय के लिए विशेष ट्रेनिंग सेंटर चलाए जा रहे हैं, जिससे खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और खेल मंत्रालय की पहल से शुरू हुए खेलो इंडिया अभियान ने ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मंच दिया है। साई के टैलेंट डेवलपमेंट कमेटी सदस्य महा सिंह राव के अनुसार, “यह पहल भारत को भविष्य के ओलंपिक में अधिक पदक दिलाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।” यह सफलता संकेत देती है कि यदि सही अवसर और संसाधन मिलें, तो दूरदराज के समुदाय भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं।


