समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से लेकर राजा हेम के पुत्र की कथा तक, जानिए धनतेरस से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं, परंपराएं और इस त्योहार का वास्तविक महत्व।
धनतेरस हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत माना जाता है। इसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। धनतेरस का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—धन और तेरस। धन का अर्थ समृद्धि और तेरस का अर्थ त्रयोदशी तिथि है। इस दिन सोना, चांदी, नए बर्तन और अन्य धातुओं की वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। लेकिन इस पर्व का संबंध केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और परिवार की खुशहाली से भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। यही वजह है कि धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे भगवान धन्वंतरि
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन करने का निर्णय हुआ। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन शुरू किया। इस मंथन से एक के बाद एक कई दिव्य रत्न और वस्तुएं प्रकट हुईं। अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए। उनके प्रकट होने से देवताओं में प्रसन्नता छा गई, क्योंकि अमृत प्राप्त होने से उन्हें अमरत्व की आशा मिली थी। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन प्रकट हुए थे। इसी कारण इस दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है। इस कथा का संदेश है कि मनुष्य के जीवन में धन के साथ स्वास्थ्य का होना भी उतना ही आवश्यक है।
राजा हेम के पुत्र की कथा, जिसने यमराज को भी कर दिया था विवश
धनतेरस से जुड़ी एक बेहद रोचक लोककथा राजा हेम के पुत्र की है। कहा जाता है कि राजा हेम के घर पुत्र का जन्म हुआ तो ज्योतिषियों ने उसकी कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा ने अपने पुत्र को इस अनहोनी से बचाने के लिए उसे महिलाओं से दूर एक सुरक्षित स्थान पर रखवाया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन राजकुमार की मुलाकात राजा हंस की पुत्री से हुई और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। उनका गंधर्व विवाह हो गया। विवाह के चौथे दिन जब मृत्यु का समय आया तो राजकुमार की पत्नी को अपने पति की भविष्यवाणी याद आ गई। उसने पूरी रात अपने पति को जगाए रखने का निश्चय किया। उसने महल के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर लगा दिया तथा चारों ओर असंख्य दीपक जला दिए। वह पूरी रात अपने पति को कहानियां सुनाती और मधुर गीत गाती रही। मान्यता है कि जब यमराज सर्प का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे तो दीपकों की चमक और सोने-चांदी की चकाचौंध से उनकी दृष्टि प्रभावित हुई। वे भीतर प्रवेश नहीं कर सके और पूरी रात गीत-संगीत सुनते रहे। सुबह होने पर यमराज वहां से लौट गए और राजकुमार की जान बच गई। इसी कथा से धनतेरस पर यमराज के नाम का दीपक जलाने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। India News+2
धनतेरस पर क्यों किया जाता है यम दीपदान?
धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमराज के नाम से दीपक जलाना चाहिए। इसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से परिवार के सदस्यों पर यमराज की कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। स्कंद पुराण में भी कार्तिक मास की त्रयोदशी पर यमराज के निमित्त दीपदान का उल्लेख मिलता है। कई परिवारों में इस दिन तेरह दीपक जलाने की परंपरा भी है। दीपदान का आध्यात्मिक अर्थ अंधकार पर प्रकाश और भय पर विश्वास की विजय से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है, इसे अकाल मृत्यु रोकने की वैज्ञानिक गारंटी नहीं समझना चाहिए। SanatanBodh+2
धनतेरस पर खरीदारी का क्या है महत्व?
धनतेरस पर सोना, चांदी, पीतल, तांबे और अन्य धातुओं से बनी वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से नए बर्तन खरीदने की परंपरा भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश से जुड़ी मानी जाती है। वहीं माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करके घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की कामना की जाती है। एक लोककथा माता लक्ष्मी और एक किसान से भी जुड़ी है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी पर आईं माता लक्ष्मी एक किसान के खेत में पहुंच गईं और उसकी फसल से आकर्षित होकर वहां रुक गईं। भगवान विष्णु ने उन्हें किसान के घर बारह वर्ष तक रहने का निर्देश दिया। इस दौरान किसान के घर में सुख-समृद्धि बढ़ने लगी। बारह वर्ष बाद जब भगवान विष्णु माता लक्ष्मी को वापस ले जाने आए तो किसान उन्हें विदा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब माता लक्ष्मी ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह हर वर्ष धनतेरस के दिन उसके घर आएंगी। इस कथा को भी धनतेरस पर माता लक्ष्मी की पूजा और घर की साफ-सफाई की परंपरा से जोड़ा जाता है।
धनतेरस का वास्तविक संदेश केवल सोना-चांदी खरीदना नहीं है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में धन के साथ स्वास्थ्य, परिवार का प्रेम, दीर्घायु और मानसिक शांति भी जरूरी है। भगवान धन्वंतरि की पूजा आरोग्य का संदेश देती है, माता लक्ष्मी की आराधना समृद्धि का और यम दीपदान जीवन की सुरक्षा एवं मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए धनतेरस भारतीय संस्कृति में धन और स्वास्थ्य दोनों के सम्मान का पर्व है।
swatantrachhattisgarh.com


