तेहरान / देश विदेश
तेहरान से उठी एक सनसनीखेज खबर ने पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति को झकझोर दिया है। ईरानी मीडिया के हवाले से दावा किया गया है कि अमेरिका और इज़राइल के कथित हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई। Tasnim News Agency और Fars News Agency ने उनकी मृत्यु की पुष्टि का दावा किया, जबकि पहले इस तरह के दावों को ईरानी अधिकारियों ने “साइकोलॉजिकल वॉरफेयर” बताया था। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump और इज़राइली सूत्रों की ओर से भी तेहरान में बमबारी के दौरान उनके मारे जाने का दावा किया गया था। यदि यह खबर आधिकारिक रूप से पुष्ट होती है, तो यह सिर्फ एक नेता की मौत नहीं, बल्कि 36 साल लंबे एक राजनीतिक युग का अंत होगा। देश में 40 दिन के सार्वजनिक शोक की घोषणा की बात भी सामने आई है, जिससे हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
ईरान की सत्ता संरचना में सुप्रीम लीडर सर्वोच्च संवैधानिक और धार्मिक प्राधिकारी होता है—राष्ट्रपति से भी ऊपर। ऐसे में खामेनेई की संभावित मौत सत्ता संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकती है। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) से जुड़े सूत्रों ने यह भी दावा किया है कि हमले में उनके परिवार के कुछ सदस्य हताहत हुए। अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि ‘वेलायत-ए-फकीह’ की व्यवस्था के तहत उत्तराधिकार की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी। क्या ईरान में सख्त रुख और मजबूत होगा या फिर आंतरिक खींचतान नई अस्थिरता को जन्म देगी? यह सवाल केवल तेहरान तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी क्षेत्रीय राजनीति के लिए निर्णायक है।
19 अप्रैल 1939 को Mashhad में जन्मे अली हुसैनी खामेनेई ने मशहद और Qom में इस्लामिक शिक्षा प्राप्त की और Ruhollah Khomeini से गहराई से प्रभावित रहे। 1979 की इस्लामिक क्रांति, जिसने Mohammad Reza Pahlavi की राजशाही का अंत किया, उसमें उनकी सक्रिय भूमिका रही। 1981 में वे राष्ट्रपति बने और 1989 में खोमैनी की मृत्यु के बाद सुप्रीम लीडर के रूप में चुने गए। उनके नेतृत्व में ईरान ने अपनी सैन्य और वैचारिक पकड़ को क्षेत्र में मजबूत किया। अगर उनकी मौत की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह ईरान के राजनीतिक भविष्य, क्षेत्रीय समीकरणों और वैश्विक कूटनीति—तीनों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
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