रायपुर / छत्तीसगढ़
साल 2014 में जब Narendra Modi के नेतृत्व में नई सरकार सत्ता में आई, तब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारों ने देश में एक बड़े आर्थिक परिवर्तन का सपना जगाया। यह कहा गया कि भारत अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भरता घटाएगा और उत्पादन क्षमता को घरेलू स्तर पर मजबूत करेगा। लेकिन यदि इन दावों को दवाइयों जैसे अत्यंत संवेदनशील और आम आदमी की जिंदगी से सीधे जुड़े क्षेत्र के आंकड़ों से परखा जाए, तो तस्वीर जटिल और चिंताजनक नजर आती है।
आयात का बढ़ता ग्राफ: आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में भारत ने लगभग 6000 टन दवाइयां आयात की थीं, जिसका मूल्य करीब 9961 करोड़ रुपये था। 2024-25 तक यह मात्रा बढ़कर 29000 टन से अधिक हो गई है। मूल्य के लिहाज से भी आयात लगातार बढ़ा—2015-16 में 10742 करोड़, 2016-17 में 11515 करोड़, 2017-18 में 12241 करोड़ और 2018-19 में 14581 करोड़ रुपये। यानी शुरुआती पांच वर्षों में ही स्पष्ट हो गया था कि आयात घटने के बजाय बढ़ रहा है।
कोविड-19 काल में यह निर्भरता और तेज हुई। 2019-20 में आयात 16530 करोड़ था, 2020-21 में 18934 करोड़ और 2021-22 में यह बढ़कर 25602 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह वही समय था जब ‘आत्मनिर्भर भारत’ एक प्रमुख राजनीतिक और नीतिगत अभियान बन चुका था। 2022-23 में कुछ गिरावट के साथ यह 21022 करोड़ रहा, लेकिन 2023-24 और 2024-25 में यह फिर 21000 से 25000 करोड़ रुपये के बीच स्थिर बना रहा। इससे संकेत मिलता है कि यह अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक प्रवृत्ति है।
चीन और अमेरिका: रणनीतिक बयानबाज़ी बनाम व्यापारिक हकीकत
राजनीतिक विमर्श में China को अक्सर रणनीतिक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन 2014-15 में जहां चीन से दवाइयों का आयात 807 करोड़ रुपये था, वहीं 2021-22 तक यह 1579 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। 2022 और 2023-24 में भी यह लगभग 1400 करोड़ रुपये के आसपास बना रहा। स्पष्ट है कि राजनीतिक तनावों के बावजूद फार्मास्युटिकल निर्भरता समाप्त नहीं हुई।
दूसरी ओर United States को रणनीतिक साझेदार कहा जाता है। 2014-15 में अमेरिका से आयात 1843 करोड़ रुपये था, जो 2021-22 में बढ़कर 4053 करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद भी यह 3000 करोड़ रुपये से ऊपर ही बना रहा। इसका अर्थ यह है कि भारत महंगी, जटिल और उच्च-प्रौद्योगिकी आधारित दवाओं के लिए अभी भी विकसित देशों पर निर्भर है।
संरचनात्मक कमजोरी और नीति का प्रश्न
भारत दुनिया का एक प्रमुख जेनेरिक दवा निर्यातक देश है, फिर भी सक्रिय औषधि संघटक (API), उच्च-स्तरीय बायोलॉजिक्स और विशेष दवाओं के मामले में आयात पर निर्भरता बनी हुई है। सरकार ने उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाएं शुरू कीं, परंतु यदि इनका व्यापक प्रभाव होता तो आयात के दीर्घकालिक रुझान में गिरावट दिखती। इसके विपरीत, भारत आज 165 से अधिक देशों से दवाइयां आयात करता है, जो आपूर्ति श्रृंखला की वैश्विक निर्भरता को दर्शाता है।
यह प्रश्न अब केवल अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का भी है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट, भू-राजनीतिक तनाव या आपूर्ति अवरोध का सीधा असर मरीजों पर पड़ सकता है। ऐसे में ‘आत्मनिर्भरता’ की अवधारणा को केवल नारे या राजनीतिक विमर्श से आगे बढ़ाकर ठोस औद्योगिक, तकनीकी और अनुसंधान-आधारित ढांचे में बदलने की आवश्यकता है। अन्यथा, स्वदेशी के आह्वान और आयात की वास्तविकता के बीच यह अंतर लगातार नीति-निर्माण पर सवाल खड़े करता रहेगा।
ख़बरें और भी…बने रहें www.swatantrachhattisgarh.com के साथ |


