जशपुर जिले में जनसंपर्क विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी पर पत्रकार को व्हाट्सएप ग्रुप में ‘अपराधी’ बताने का आरोप। खबर कर्मचारी की कथित प्रताड़ना और आत्महत्या के प्रयास से जुड़ी। पत्रकार ने घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया। वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे प्रेस स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा बताया।
खबर की पृष्ठभूमि और आरोप
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जनसंपर्क विभाग से जुड़ा एक विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने जनसंपर्क कार्यालय के एक कर्मचारी रविंद्रनाथ राम द्वारा कथित प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या का प्रयास किए जाने की खबर प्रकाशित की थी। परिवाद के अनुसार, कर्मचारी ने 20 अगस्त को थाने में लिखित शिकायत दी थी, जिसके आधार पर 2 सितंबर को यह समाचार प्रकाशित हुआ। आरोप है कि खबर सामने आने के बाद विभाग की सहायक संचालक ने सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को ‘अपराधी’ बताकर उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया। इस ग्रुप में प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी जुड़े बताए जाते हैं, जिससे पत्रकार ने इसे पद और शक्ति के दुरुपयोग का मामला बताया है।
व्हाट्सएप पर टिप्पणी, मानहानि नोटिस और कानूनी पहलू
पत्रकार का आरोप है कि बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के सार्वजनिक मंच पर अपराधी ठहराया जाना संविधान और कानून की मूल भावना के खिलाफ है। इसके बाद संबंधित अधिकारी की ओर से एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजे जाने की भी बात सामने आई है। पत्रकार ने इस पूरे घटनाक्रम की शिकायत पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को भेजी, लेकिन किसी ठोस कार्रवाई के अभाव में उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराओं के तहत घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया है। मामला अब न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष विचाराधीन है।
प्रेस स्वतंत्रता पर सवाल और वरिष्ठ पत्रकारों की प्रतिक्रिया
इस प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा, “इस तरह के मामलों को हल्के में लेना या टालना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे पद और सत्ता का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का मनोबल बढ़ता है।” उन्होंने आगे कहा, “एक पत्रकार नोटिस और मानहानि तक तो झेल लेता है, लेकिन आगे बढ़कर झूठे आरोपों के जरिए पत्रकारों को जेल भेजने के उदाहरण भी सामने आए हैं। यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।” वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के अधिकार और सम्मान से जुड़ा है। अब निगाहें अदालत और प्रशासन पर टिकी हैं कि आलोचना और अपराध के बीच की संवैधानिक रेखा को किस तरह स्पष्ट किया जाता है।
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