जगदलपुर/छत्तीसगढ़
हाइलाइट बॉक्स
बस्तर जिले के परपा थाना क्षेत्र में 12वीं साइंस की 18 वर्षीय छात्रा की आत्महत्या ने एक बार फिर परीक्षा दबाव और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों के अनुसार, अर्धवार्षिक परीक्षा के कुछ पेपर खराब होने से छात्रा गहरे तनाव में थी।
परीक्षा तनाव ने छीनी जिंदगी
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले से एक हृदयविदारक मामला सामने आया है, जहां 12वीं कक्षा की छात्रा साधना पटेल (18) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। साधना ग्राम घाटपदमुर भाटीगुड़ा की निवासी थी और 12वीं साइंस की छात्रा थी। बताया जा रहा है कि हाल ही में संपन्न हुई अर्धवार्षिक परीक्षाओं में कुछ विषयों के पेपर अपेक्षा के अनुरूप नहीं होने से वह मानसिक रूप से काफी परेशान थी। इस चिंता को उसने परिजनों से भी साझा किया था, लेकिन तनाव धीरे-धीरे गहराता चला गया।
घर में अकेलेपन के दौरान उठाया कदम
जानकारी के अनुसार, 17 दिसंबर को परीक्षा समाप्त होने के बाद से साधना लगातार तनाव में थी। घटना के दिन जब परिजन घर पर मौजूद नहीं थे, तभी उसने यह आत्मघाती कदम उठाया। जब परिजन घर लौटे तो उन्होंने साधना को फंदे से लटकता पाया। घबराए परिजन तत्काल उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। परपा थाना पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस जांच और सामाजिक चिंता
पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टया मामला मानसिक तनाव से जुड़ा प्रतीत हो रहा है, हालांकि सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। यह घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि परीक्षा और प्रदर्शन के दबाव में युवा किस कदर टूट सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी भी इस तरह की घटनाओं को और गंभीर बना देती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. पी.के. शर्मा के अनुसार, परीक्षा और पढ़ाई का दबाव कई बार छात्रों को अवसाद और निराशा की ओर धकेल देता है। उनका कहना है कि परिवार और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में होने वाले छोटे बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए। वे सलाह देते हैं कि बच्चों से नियमित बातचीत की जाए, उन्हें यह समझाया जाए कि परीक्षा के अंक जीवन का अंतिम पैमाना नहीं हैं, पढ़ाई के साथ पर्याप्त नींद, खेल और आराम को महत्व दिया जाए। यदि उदासी, चिड़चिड़ापन या भूख-नींद में बदलाव दिखे तो तुरंत विशेषज्ञ से मदद लेनी चाहिए। स्कूल और कॉलेजों में काउंसलिंग सुविधाओं को भी मजबूत किया जाना समय की मांग है।


