स्वतंत्र छत्तीसगढ़
सूरजपुर: 14 सितम्बर 2025 — छत्तीसगढ़ में शिक्षा सत्र शुरू हुए चार महीने होने को हैं, लेकिन इस दौरान स्कूलों की हालत देखकर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या सरकारी वादे और ज़मीनी हकीकत एक-दूसरे से मेल खाते हैं? सूरजपुर जिले के कैलाशपुर के पटपरियापारा स्थित माध्यमिक शाला की स्थिति इस सवाल को और तीखा कर देती है। यहां बच्चों की पढ़ाई जिस तरह से करवाई जा रही है, उसे देखकर किसी का भी माथा ठनक सकता है।
एक कमरे में दो कक्षाएं, बीच में पर्दा:
यहां कक्षा आठवीं तक पढ़ाई होती है। लेकिन समस्या यह है कि पर्याप्त कमरे नहीं हैं। नतीजतन, अतिरिक्त कक्ष में कक्षा सातवीं और आठवीं की पढ़ाई एक साथ करवाई जाती है। दोनों कक्षाओं को अलग दिखाने के लिए बीच में एक बड़ा पर्दा टांग दिया गया है। पर्दा तो दो हिस्से कर देता है, लेकिन आवाज़ें दीवार नहीं मानतीं। छात्रों का कहना है कि जब एक तरफ शिक्षक पढ़ाते हैं तो उनकी आवाज़ दूसरी ओर भी जाती है। इससे पढ़ाई में ध्यान भटकता है।
अधूरा भवन बना मुसीबत:
असल में इस स्कूल का उन्नयन साल 2006 में स्वीकृत हुआ था। 2010 तक कुछ काम हुआ, लेकिन उसके बाद निर्माण कार्य ठप पड़ गया। जो हिस्सा बना, उसकी छत अब टपकने लगी है और दीवारों पर झाड़ियां उग आई हैं। शिक्षक बताते हैं कि वहां कक्षा लगाना खतरनाक है, क्योंकि कभी भी ढांचा गिर सकता है।
प्रधान पाठक बृजमोहन पटेल बताते हैं—“हमने कई बार अधिकारियों को अवगत कराया। डीईओ साहब निरीक्षण भी कर गए, लेकिन आज तक काम पूरा नहीं हो सका। अब हाल ये है कि बच्चों को पर्दे के पीछे पढ़ाना पड़ रहा है।”
सुविधाओं का टोटा, परेशानी का अंबार:
जिस गेट से स्कूल तक पहुंचा जाता था, वह भी निर्माण के दौरान क्षतिग्रस्त होकर बंद हो गया। बच्चों को अब कीचड़ भरे रास्ते से होकर स्कूल आना पड़ता है। पीने का पानी विद्यालय में उपलब्ध नहीं है, बाहर से लाना पड़ता है। बरसात के दिनों में स्कूल परिसर चारों ओर से पानी और कीचड़ से भर जाता है। इन परिस्थितियों में बच्चों को न केवल शिक्षा से समझौता करना पड़ रहा है, बल्कि स्कूल आना भी उनके लिए चुनौती बन गया है।
जिम्मेदारों का जवाब:
नवनियुक्त जिला शिक्षा अधिकारी अजय मिश्रा ने कहा—“यहां हाल ही में मेरी पोस्टिंग हुई है। आपकी रिपोर्ट से मुझे इस समस्या की जानकारी मिली है। बीआरसी के माध्यम से जानकारी मंगाकर मामले में संज्ञान लिया जाएगा। जल्द ही आवश्यक कार्यवाही कर व्यवस्था को सुधारा जाएगा।”
किताबों की थ्योरी बनाम हकीकत:
इन हालातों ने कवि की पंक्तियों को सच कर दिया है—“तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।” सरकार की फाइलों में शिक्षा व्यवस्था भले ही शानदार दिखाई देती हो, लेकिन हकीकत यह है कि पटपरियापारा जैसे कई स्कूल पर्दों और असुविधाओं के बीच बच्चों का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं।
बड़ा सवाल:
क्या ऐसी व्यवस्थाओं के बीच पढ़ रहे बच्चे उस स्तर की शिक्षा हासिल कर पाएंगे, जिसकी गारंटी सरकार देती है?
या फिर यह सिस्टम उन्हें मजबूर कर देगा कि वे अपने सपनों को अधूरा छोड़ दें?
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