जगदलपुर, 27 जून – छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में आज ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा प्रसिद्ध गोंचा पर्व पूरे धूमधाम से मनाया जाएगा। भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र के कुल 22 देव विग्रहों को तीन भव्य रथों में विराजित कर रथयात्रा निकाली जाएगी। परंपरा अनुसार, श्रद्धालु बांस की बनी तुपकी से भगवान को सलामी देंगे।
रथयात्रा का मार्ग और विशेष आयोजन:
शाम 4 बजे रथयात्रा जगदलपुर स्थित सिरहसार भवन के सामने जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ होगी, जो गोलबाजार और दंतेश्वरी मंदिर चौक से होते हुए सिरहासार पहुंचेगी। यहां पर जनकपुरी के रूप में सजाए गए स्थल में भगवान के विग्रहों की स्थापना की जाएगी।
परंपरा और ऐतिहासिक मान्यता:
इस वर्ष गोंचा पर्व 11 जून को देव स्नान पूर्णिमा से प्रारंभ हुआ था। 12 से 25 जून तक भगवान “अनसर काल” में रहे, जिसमें दर्शन वर्जित रहते हैं। इस अवधि में पुजारियों ने भगवान को विशेष भोग अर्पित किए। 26 जून को नेत्रोत्सव मनाया गया और आज 27 जून को भगवान की रथ यात्रा निकाली जा रही है।
गोंचा पर्व के दौरान भगवान को अपनी मौसी के घर जनकपुरी ले जाया जाता है, जहां विग्रहों को 9 दिनों तक स्थापित किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन संस्कार करवाते हैं और मन्नतें मांगते हैं।
618 वर्ष पुरानी परंपरा:
मान्यता है कि बस्तर के तत्कालीन राजा पुरुषोत्तम देव करीब 618 साल पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर में दंडवत करते हुए पहुंचे थे। उन्हें वहां ‘रथपति’ की उपाधि और 16 पहियों वाला रथ भेंट किया गया था। इसे बस्तर लाना कठिन था, इसलिए उन्होंने रथ को तीन भागों में बांटा – एक रथ में 8 चक्के और दो अन्य में 4-4 चक्के लगाए। तभी से यहां तीन रथों में रथयात्रा की परंपरा चल रही है।
गोंचा पर्व बस्तर की आस्था, संस्कृति और इतिहास का प्रतीक है। यह पर्व न सिर्फ धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, बल्कि बस्तर की लोकपरंपरा और एकता का भी प्रतीक माना जाता है।
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