छह लाख से अधिक खिलाड़ियों ने कराया पंजीयन, दिव्यांग और आत्मसमर्पित माओवादी भी दिखाएंगे खेल प्रतिभा; 11 खेल विधाओं में होगा मुकाबला |
जगदलपुर। बस्तर की धरती अब अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के साथ खेल प्रतिभाओं के दम पर भी नई पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। गांवों और दूरस्थ अंचलों में छिपी खेल प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के उद्देश्य से बस्तर ओलंपिक के तीसरे संस्करण का आगाज हो गया है। इस बार आयोजन को लेकर खिलाड़ियों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। संभाग के सातों जिलों से कुल 6 लाख 492 खिलाड़ियों ने पंजीयन कराया है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 3 लाख 92 हजार थी। इस तरह एक वर्ष में खिलाड़ियों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो बस्तर में खेलों के प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाती है।
इस बार बस्तर ओलंपिक में कुल 11 खेल विधाओं को शामिल किया गया है। इनमें एथलेटिक्स, तीरंदाजी, बैडमिंटन, फुटबॉल, हॉकी, वेटलिफ्टिंग, कराटे, कबड्डी, खो-खो और वॉलीबॉल सहित अन्य खेल शामिल हैं। प्रतियोगिताएं जूनियर और सीनियर वर्ग में आयोजित की जाएंगी, जिससे अलग-अलग आयु वर्ग के खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा। आयोजन की विशेषता यह भी है कि नक्सल हिंसा से प्रभावित दिव्यांग व्यक्तियों और आत्मसमर्पित माओवादियों को भी खेल के मैदान में उतरने का अवसर दिया जा रहा है। ऐसे लगभग 500 प्रतिभागी इस आयोजन में हिस्सा लेंगे। यह पहल खेलों के माध्यम से सामाजिक समावेश और सकारात्मक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
बस्तर ओलंपिक का उद्देश्य केवल खेल प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए दूरस्थ वनांचलों में रहने वाले युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना, उनकी प्रतिभा को पहचान देना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना भी है। खेलों के माध्यम से युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। खास बात यह है कि इस आयोजन में दिव्यांगों और आत्मसमर्पित माओवादियों की भागीदारी बस्तर में शांति, विश्वास और सामाजिक पुनर्वास का भी संदेश देती है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बस्तर के खिलाड़ी अपने प्रदर्शन से कौन-सी नई उपलब्धियां हासिल करते हैं और इस आयोजन से क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं को भविष्य में कितनी बड़ी पहचान मिलती है।
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