सम्पादकीय
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के गायन के क्रम को लेकर जारी किए गए स्पष्ट निर्देश केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय गरिमा और संवैधानिक मर्यादा को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं। अब यदि किसी सरकारी समारोह में दोनों की प्रस्तुति एक साथ होगी तो पहले वंदे मातरम् और उसके बाद जन-गण-मन का गायन किया जाएगा। जिन राज्यों में राज्यगीत भी गाया जाता है, वहां राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बाद ही राज्यगीत प्रस्तुत होगा। यह व्यवस्था देशभर में एकरूपता और गरिमा बनाए रखने का प्रयास है।
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत केवल गीत नहीं हैं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाई, जबकि जन-गण-मन स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बना। इसलिए इन दोनों की प्रस्तुति केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है। ऐसे में इनके गायन का निर्धारित क्रम और शिष्टाचार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
दुर्भाग्य से समय-समय पर विभिन्न राज्यों और सार्वजनिक आयोजनों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के क्रम को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। कहीं जानकारी के अभाव में तो कहीं राजनीतिक कारणों से निर्धारित परंपराओं की अनदेखी की गई। इससे अनावश्यक विवाद पैदा हुए और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान भी प्रभावित हुआ। गृह मंत्रालय के नए निर्देश इस भ्रम को समाप्त करने की दिशा में सकारात्मक कदम हैं।
हालांकि, केवल निर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि सभी सरकारी विभाग, शैक्षणिक संस्थान, सार्वजनिक उपक्रम और आयोजन समितियां इन नियमों का गंभीरता से पालन करें। साथ ही, आम नागरिकों को भी राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से जुड़े प्रोटोकॉल की जानकारी दी जानी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने से नई पीढ़ी में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना और मजबूत होगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान किसी राजनीतिक विचारधारा या दल से जुड़ा विषय नहीं है। यह पूरे देश की साझा विरासत है। राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक विवादों से दूर रखना ही लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक है। जब पूरा देश एक स्वर में अपने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान करेगा, तभी राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश और अधिक सशक्त होगा।
सरकार का यह निर्णय स्वागतयोग्य है, लेकिन इसकी सफलता तभी मानी जाएगी जब नियम केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रहें, बल्कि हर सरकारी और सार्वजनिक आयोजन में समान रूप से लागू हों। राष्ट्रीय सम्मान का वास्तविक अर्थ तभी है, जब उसका पालन स्वेच्छा, अनुशासन और गर्व के साथ किया जाए। यही एक सशक्त, जागरूक और जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान भी है।


