रायपुर / छत्तीसगढ़
मुख्य बिंदु:
- बजट सत्र में नक्सलवाद पर जोरदार बहस
- कवासी लखमा ने गृह मंत्री को दी बधाई
- आदिवासी उत्पीड़न और ‘पंडुम’ को लेकर उठाए सवाल
- आरएसएस पर षड्यंत्र का आरोप, सदन में तीखी नोकझोंक
बजट सत्र में नक्सलवाद पर अहम चर्चा
रायपुर में चल रहे छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के तीसरे दिन नक्सलवाद और बस्तर के हालात को लेकर सदन में गंभीर और लंबी बहस देखने को मिली। सदन की कार्यवाही के दौरान कांग्रेस विधायक Kawasi Lakhma ने कहा कि प्रदेश की सबसे बड़ी और वर्षों पुरानी समस्या नक्सलवाद अब खत्म होने की दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने इस बदलाव को महत्वपूर्ण बताते हुए गृह मंत्री को बधाई दी और कहा कि सुरक्षा बलों की रणनीति तथा प्रशासनिक प्रयासों का असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है। लखमा ने अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ा कि उन्होंने स्वयं कभी कल्पना नहीं की थी कि बस्तर में नक्सल गतिविधियां इतनी कमजोर पड़ जाएंगी। उनका कहना था कि आज बस्तर के कई गांवों में लोग पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और शांतिपूर्ण वातावरण में जीवन यापन कर पा रहे हैं।
बस्तर में बदले हालात और सामाजिक संकेत
लखमा ने अपने भाषण में बस्तर क्षेत्र का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि कभी भय और अनिश्चितता के साये में जीने वाले लोग अब सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। बाजार खुल रहे हैं, स्कूलों में उपस्थिति बढ़ी है और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं की पहुंच भी बेहतर हुई है। उन्होंने कहा कि यह सकारात्मक परिवर्तन स्वागत योग्य है और इसे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नक्सलवाद के कमजोर होने का अर्थ यह नहीं है कि जमीनी समस्याएं पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। आदिवासी इलाकों में आज भी मूलभूत सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को लेकर चुनौतियां मौजूद हैं। उनके अनुसार, स्थायी शांति तभी संभव है जब विकास और विश्वास दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।
सरकार पर गंभीर आरोप और आदिवासी मुद्दा
जहां एक ओर लखमा ने नक्सलवाद के कमजोर पड़ने को सकारात्मक संकेत बताया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान शासनकाल में आदिवासी समाज के साथ अन्याय की घटनाएं बढ़ी हैं और कुछ मामलों में प्रशासन की भूमिका संदिग्ध रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी मुख्यमंत्री के रहते आदिवासियों की हत्या जैसी घटनाएं अत्यंत चिंताजनक हैं। लखमा ने ‘पंडुम’ के नाम पर हो रही गतिविधियों पर भी सवाल उठाए और कहा कि सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों की आड़ में समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उनका कहना था कि यदि किसी भी स्तर पर समाज को बांटने का प्रयास हुआ तो इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और शांति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
‘पंडुम’ और सामाजिक समरसता पर बहस
सदन में लखमा ने कहा कि बस्तर की पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक एकता से है। यदि किसी आयोजन या अभियान के कारण समाज के भीतर अविश्वास पैदा होता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह स्पष्ट करे कि इन गतिविधियों का उद्देश्य क्या है और स्थानीय समुदायों से संवाद की प्रक्रिया किस स्तर तक की गई है। लखमा के वक्तव्य के दौरान सदन का माहौल कई बार गर्म हो गया और पक्ष-विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी टिप्पणियां भी सुनाई दीं।
आरएसएस पर आरोप, भाजपा की आपत्ति
अपने भाषण के दौरान लखमा ने यह भी आरोप लगाया कि पूरे घटनाक्रम के पीछे Rashtriya Swayamsevak Sangh की भूमिका हो सकती है। उन्होंने इसे एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताते हुए कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है। इस बयान पर भाजपा विधायक Sushant Shukla ने कड़ी आपत्ति जताई और आरोपों को निराधार तथा राजनीतिक प्रेरित बताया। शुक्ला ने कहा कि बिना प्रमाण के किसी संगठन पर आरोप लगाना अनुचित है और इससे सदन की गरिमा प्रभावित होती है। कुछ समय तक दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक चली, जिसके बाद अध्यक्ष के हस्तक्षेप से स्थिति सामान्य हुई और कार्यवाही आगे बढ़ी।
राजनीतिक संदेश और आगे की राह
छत्तीसगढ़ विधानसभा में हुई इस बहस ने स्पष्ट कर दिया है कि नक्सलवाद का मुद्दा केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का भी विषय है। एक ओर सरकार नक्सल उन्मूलन को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं विपक्ष जमीनी स्तर पर आदिवासी अधिकारों और सामाजिक संतुलन के प्रश्न उठा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में बस्तर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास, सुरक्षा और सामाजिक समरसता के मुद्दे पर और अधिक बहस देखने को मिल सकती है। फिलहाल, बजट सत्र में उठे इस मुद्दे ने प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद भी बहस समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है।
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