रायपुर / छत्तीसगढ़
मुख्य बातें (Highlight ):
- बरनवापारा अभयारण्य में काले हिरणों की संख्या लगभग 200 पहुँची
- ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने की संरक्षण प्रयासों की सराहना
- 1970 के बाद क्षेत्र से लगभग विलुप्त हो चुके थे काले हिरण
- वैज्ञानिक प्रबंधन और निगरानी से मिली बड़ी सफलता
- भविष्य में खुले जंगल में छोड़ने की तैयारी
रायपुर, 26 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के लिए यह गौरवपूर्ण क्षण रहा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम मन की बात में बरनवापारा अभयारण्य में काले हिरणों के संरक्षण की सराहना की। इस उल्लेख ने राज्य के पर्यावरणीय प्रयासों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी इस उपलब्धि को प्रदेश के लिए प्रेरणादायक बताया, जिससे जमीनी स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों और विशेषज्ञों का मनोबल बढ़ा है।
विलुप्ति से पुनर्जीवन तक की यात्रा
बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य, जो लगभग 245 वर्ग किलोमीटर में फैला है, कभी काले हिरणों से लगभग खाली हो चुका था। 1970 के दशक के बाद अतिक्रमण और आवास क्षति के कारण यह प्रजाति यहां से लुप्त हो गई थी। लेकिन 2018 में राज्य वन्यजीव बोर्ड की स्वीकृति के बाद पुनर्स्थापन योजना शुरू हुई, जिसके परिणामस्वरूप आज यहां काले हिरणों की संख्या करीब 200 तक पहुंच गई है।
वैज्ञानिक प्रबंधन और चुनौतियों से मिली सफलता
संरक्षण के शुरुआती दौर में कई बाधाएं सामने आईं। निमोनिया जैसी बीमारी के कारण कुछ काले हिरणों की मृत्यु भी हुई, लेकिन इसके बाद प्रबंधन में सुधार किए गए। बाड़ों में रेत की परत, बेहतर जल निकासी, स्वच्छता व्यवस्था और पशु चिकित्सक की नियुक्ति जैसे कदम उठाए गए। इन प्रयासों से धीरे-धीरे स्थिति स्थिर हुई और संख्या में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई।
अनुकूल वातावरण बना सफलता की कुंजी
बरनवापारा के खुले घास के मैदान काले हिरणों के लिए प्राकृतिक और अनुकूल आवास साबित हुए हैं। बेहतर पोषण, नियमित निगरानी और सुरक्षित वातावरण ने इन्हें तेजी से बढ़ने में मदद की। अब ये अपने नए परिवेश में पूरी तरह ढल चुके हैं, जिससे भविष्य में इन्हें खुले जंगल में छोड़ने की दिशा में भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
काले हिरण: पहचान और विशेषताएं
काला हिरण भारतीय उपमहाद्वीप की एक आकर्षक और संवेदनशील प्रजाति है। नर का रंग गहरा भूरा या काला होता है और उसके लंबे सर्पिलाकार सींग होते हैं, जबकि मादा हल्के भूरे रंग की होती है। ये मुख्यतः घास के मैदानों में रहते हैं और दिन में सक्रिय रहते हैं। इनकी तेज गति और विशिष्ट संरचना इन्हें अन्य मृगों से अलग बनाती है।


