स्वतंत्र छत्तीसगढ़ डेस्क
हाइलाइट
- पहले फेज में 152 सीटों पर 93% मतदान
- 2021 में कुल मतदान 82% था
- SIR के बाद वोटर्स कम, लेकिन वोटिंग संख्या लगभग समान
- महिलाओं और सुरक्षा ने बढ़ाई भागीदारी
- हाई टर्नआउट का रिजल्ट पर सीधा असर तय नहीं
बढ़ा हुआ मतदान: आंकड़ों के पीछे की सच्चाई
पश्चिम बंगाल में पहले चरण में लगभग 93% मतदान ने राजनीतिक माहौल को असाधारण बना दिया है। यह 2021 के 82% मतदान से काफी अधिक है, जिससे संकेत मिलता है कि मतदाताओं की भागीदारी इस बार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है। हालांकि, इसका एक बड़ा कारण “SIR” प्रक्रिया भी है, जिसमें लगभग 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। इससे कुल मतदाता संख्या घट गई, लेकिन वोट डालने वालों की संख्या लगभग वही रही—जिसके कारण प्रतिशत बढ़ा हुआ दिख रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, अगर 2021 जितनी संख्या में लोग वोट डालते हैं, तो इस बार टर्नआउट 86% से ऊपर जाना तय है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड होगा।
महिला वोटर्स और योजनाओं की राजनीति
इस चुनाव में महिलाओं की भूमिका निर्णायक बनती दिख रही है। Mamata Banerjee की लक्ष्मी भंडार योजना और उसके विस्तार का वादा, वहीं Bharatiya Janata Party द्वारा 3000 रुपए मासिक सहायता, मुफ्त बस यात्रा और 33% आरक्षण जैसे वादों ने महिला मतदाताओं को सक्रिय किया है। पिछले कुछ वर्षों में यह ट्रेंड उभरा है कि महिलाओं के लिए सीधी आर्थिक मदद देने वाली योजनाएं चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं। 15 राज्यों के हालिया चुनावों में इस तरह की योजनाओं की सफलता दर लगभग 90% रही है, जो इस फैक्टर को और मजबूत बनाती है।
सुरक्षा और कम हिंसा का असर
पश्चिम बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा के लिए चर्चा में रहा है। 2021 में 278 हिंसक घटनाएं दर्ज हुई थीं। इस बार केंद्र ने 2.4 लाख से अधिक सुरक्षा बलों की तैनाती की, जिससे मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक, कम हिंसा और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था ने आम मतदाता—खासकर महिलाओं—को निडर होकर मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया है।
एंटी-इनकंबेंसी बनाम भरोसे की लड़ाई
लगातार 15 वर्षों से सत्ता में रहने के कारण ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी भी एक बड़ा मुद्दा है। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर असंतोष सामने आता रहा है। हालांकि, सर्वे बताते हैं कि अभी भी बड़ी संख्या में मतदाता उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि ज्यादा वोटिंग बदलाव की चाह का संकेत है या मौजूदा सरकार पर भरोसे का।
किसे फायदा? कोई साफ पैटर्न नहीं
इतिहास और आंकड़ों के आधार पर यह कहना कठिन है कि ज्यादा मतदान से किस पार्टी को फायदा होगा। शोध बताते हैं कि हाई टर्नआउट कभी-कभी कड़ी टक्कर (competitive election) का संकेत होता है। देशभर के 300+ चुनावों के विश्लेषण में यह पाया गया कि मतदान प्रतिशत बढ़ने या घटने का सीधा संबंध सत्ता परिवर्तन से नहीं है। कुछ मामलों में ज्यादा वोटिंग से सरकार बदली, तो कई बार वही सरकार दोबारा लौट आई।
पश्चिम बंगाल में इस बार का उच्च मतदान कई कारकों का परिणाम है—SIR, महिला वोटर्स की सक्रियता, बेहतर सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा। लेकिन यह तय करना अभी संभव नहीं कि इससे भारतीय जनता पार्टी को फायदा होगा या ममता बनर्जी की वापसी होगी। एक बात जरूर साफ है—इस बार जनता ने लोकतंत्र में अपनी भागीदारी पूरे जोश के साथ दर्ज कराई है, और नतीजे बेहद दिलचस्प होने वाले हैं।
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