रामावतार जग्गी हत्याकांड, सुप्रीम कोर्ट से अमित जोगी को राहत नहीं, 23 अप्रैल को संयुक्त सुनवाई तय…

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हाइलाइट बॉक्स

  • सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी को फिलहाल राहत देने से इनकार किया
  • 23 अप्रैल को दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई होगी
  • हाईकोर्ट ने पहले ही उम्रकैद की सजा सुनाई थी
  • 2003 में हुई थी NCP नेता रामावतार जग्गी की हत्या
  • केस में कई पुलिस अधिकारियों समेत 28 लोग दोषी ठहराए गए

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की नई तारीख तय

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में Amit Jogi को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने उनके द्वारा दायर याचिकाओं को एक साथ टैग करते हुए 23 अप्रैल को संयुक्त सुनवाई की तारीख तय कर दी है। जोगी ने जिन दो आदेशों को चुनौती दी थी, उनमें CBI को अपील की अनुमति देने वाला आदेश और हाईकोर्ट का वह फैसला शामिल है, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था। इस फैसले के बाद मामले ने एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील और जोगी का बयान

इससे पहले 6 अप्रैल को हाईकोर्ट ने अमित जोगी को IPC की धारा 302 और 120-बी के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी और तीन हफ्तों में सरेंडर करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ जोगी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकीलों की मजबूत टीम कोर्ट में पेश हुई और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। जोगी का यह बयान उनके समर्थकों के बीच विश्वास बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

2003 की हत्या और लंबा कानूनी सफर

यह मामला 4 जून 2003 का है, जब NCP नेता Ramavatar Jaggi की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जांच में 31 आरोपियों को शामिल किया गया था, जिनमें से दो सरकारी गवाह बन गए। हालांकि 2007 में ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था, लेकिन बाद में अपील के बाद मामला फिर से खुला और हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। इस केस में कई प्रभावशाली नाम और पुलिस अधिकारी भी शामिल रहे, जिससे यह मामला वर्षों तक चर्चा में बना रहा।

साजिश के आरोप और राजनीतिक विवाद

मामले में मृतक के बेटे सतीश जग्गी की ओर से आरोप लगाया गया कि यह हत्या तत्कालीन राज्य सरकार के संरक्षण में की गई साजिश का हिस्सा थी। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि CBI जांच के दौरान सबूतों को प्रभावित किया गया, इसलिए केवल भौतिक साक्ष्य नहीं बल्कि पूरे षड्यंत्र की परतें खोलना जरूरी है। इस तर्क ने केस को केवल एक आपराधिक घटना से आगे बढ़ाकर राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया, जिसमें सत्ता और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोप भी जुड़े।

कौन थे रामावतार जग्गी और केस का प्रभाव

रामावतार जग्गी एक कारोबारी पृष्ठभूमि के नेता थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री Vidyacharan Shukla के करीबी माने जाते थे। NCP में शामिल होने के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ में पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया था। इस हत्याकांड में कई पुलिस अधिकारियों, नेताओं और कथित शूटरों को दोषी ठहराया गया, जिससे यह मामला राज्य की न्यायिक और राजनीतिक प्रणाली पर लंबे समय तक असर डालता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जो इस लंबे चले आ रहे केस को नई दिशा दे सकती है।

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