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Sunday, March 1, 2026

अवैध प्रवास और सुरक्षा का सवाल, हाईकोर्ट ने बांग्लादेशी महिला की हैबियस कॉर्पस याचिका की खारिज…

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हाईलाइट बॉक्स

  • अवैध रूप से भारत में रह रही बांग्लादेशी महिला को नारी निकेतन में रखना उचित बताया गया
  • हैबियस कॉर्पस तभी लागू जब हिरासत गैर-कानूनी हो — कोर्ट
  • डिपोर्टेशन प्रक्रिया शुरू, सुरक्षा को प्राथमिकता
  • याचिकाकर्ता पर बांग्लादेश में अपहरण का मामला दर्ज

अवैध प्रवास और संरक्षण पर अदालत की स्पष्ट टिप्पणी

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बांग्लादेशी युवती और उसके नाबालिग बेटे को नारी निकेतन से मुक्त करने की मांग वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि महिला का भारत में कोई वैध अभिभावक नहीं है और वह अवैध रूप से देश में रह रही है। ऐसे में उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और विधिक प्रक्रिया को देखते हुए नारी निकेतन में रखा जाना एक वैध और अस्थायी व्यवस्था है, न कि दंडात्मक कार्रवाई।

पति बताने वाले व्यक्ति की दलीलें

मामला तब सामने आया जब बिलासपुर निवासी एक व्यक्ति ने खुद को महिला का पति बताते हुए याचिका दायर की। उसने दावा किया कि वह देवरीखुर्द का रहने वाला है और अलग धर्म होने के कारण दोनों ने भागकर विवाह किया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी और बेटे को रायपुर स्थित नारी निकेतन में जबरन रखा गया है और उन्हें उसके सुपुर्द किया जाना चाहिए। इस दावे ने मामले को भावनात्मक मोड़ दिया, परंतु अदालत ने तथ्यों और कानूनी स्थिति को प्राथमिकता दी।

सरकार का पक्ष और पृष्ठभूमि

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता और महिला दोनों बांग्लादेशी नागरिक हैं, जो बिना वैध दस्तावेज भारत आए थे। महिला गर्भवती थी, इसलिए पहले उसे बाल कल्याण समिति की देखरेख में रखा गया और बाद में नारी निकेतन भेजा गया, जहां उसने बच्चे को जन्म दिया। यह भी जानकारी दी गई कि याचिकाकर्ता के खिलाफ बांग्लादेश में अपहरण का मामला दर्ज है। पुलवामा घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता के बीच बिलासपुर पुलिस ने पति-पत्नी को हिरासत में लिया था।

हैबियस कॉर्पस की कानूनी सीमा

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस याचिका तभी स्वीकार्य होती है जब किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो। इस मामले में महिला और बच्चे को सजा के रूप में नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और देखभाल के उद्देश्य से रखा गया है। अदालत ने कहा कि जब तक निर्वासन (डिपोर्टेशन) की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक नारी निकेतन में रहना एक वैध प्रशासनिक व्यवस्था है।

मानवीय और विधिक संतुलन की दृष्टि

अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि किसी भी विदेशी नागरिक के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा, विधिक प्रक्रिया और मानवीय सरोकार—तीनों का संतुलन आवश्यक है। महिला और उसके बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है, विशेषकर तब जब वे बिना दस्तावेज देश में पाए गए हों। डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और उसके पूर्ण होने तक नारी निकेतन में रहना ही उनके हित में है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।

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