स्वतंत्र छत्तीसगढ़ आलेख : जी.भूषण
रायपुर, छत्तीसगढ़। भारतीय संस्कृति पर्वों, परंपराओं और प्रकृति के प्रति श्रद्धा से समृद्ध रही है। इन्हीं प्राचीन परंपराओं में एक महत्वपूर्ण पर्व है नागपंचमी, जो नागों के प्रति सम्मान, आस्था और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देता है। सावन मास में मनाया जाने वाला यह पर्व धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। नागपंचमी के दिन श्रद्धालु भगवान शिव के साथ नाग देवता की पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा मंगल की कामना करते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध का भी प्रतीक है।
भारतीय परंपरा में नागों का विशेष स्थान : भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में नागों को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भगवान शिव के गले में वासुकी नाग का होना नागों की महत्ता को दर्शाता है। भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर विराजमान बताए गए हैं, जबकि श्रीकृष्ण के जीवन से भी कालिय नाग की प्रसिद्ध कथा जुड़ी हुई है। महाभारत और पुराणों में अनेक नागों का उल्लेख मिलता है। अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और शेषनाग जैसे नाम भारतीय धार्मिक साहित्य में विशेष रूप से वर्णित हैं। नागों को शक्ति, संरक्षण और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक माना गया है।
सावन और नागपंचमी का धार्मिक महत्व : नागपंचमी का पर्व सावन मास की शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को मनाया जाता है। सावन को भगवान शिव की आराधना का विशेष महीना माना जाता है, इसलिए इस दौरान नाग देवता की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। मंदिरों और घरों में लोग विधि-विधान से पूजा करते हैं। कई स्थानों पर दीवारों या पूजा स्थल पर नाग का चित्र बनाकर पूजन की परंपरा है। श्रद्धालु भगवान शिव और नाग देवता को दूध, जल, फूल तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
हालांकि धार्मिक आस्था के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक व्यवहार का सम्मान करना भी आवश्यक है। जीवित सांपों को पकड़ना, परेशान करना या उन्हें जबरन कोई पदार्थ पिलाने जैसी गतिविधियां उनके लिए हानिकारक हो सकती हैं। इसलिए नागपंचमी का वास्तविक संदेश प्रकृति के इन महत्वपूर्ण जीवों के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना से जुड़ा होना चाहिए।
भगवान शिव और नागों का संबंध : भगवान शिव की प्रतिमा और स्वरूप के साथ नाग का विशेष संबंध दिखाई देता है। शिवजी के गले में विराजमान नाग को भय पर विजय, शक्ति और नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागों का संबंध केवल भय से नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति और संरक्षण से भी है। यही कारण है कि सावन में भगवान शिव की पूजा के साथ नागों की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। शिवभक्त इस दिन विशेष पूजा कर अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
श्रीकृष्ण और कालिय नाग की कथा : नागों से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में श्रीकृष्ण और कालिय नाग की कथा भी शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कालिय नाग यमुना नदी में रहता था और उसके विष के कारण आसपास का वातावरण प्रभावित हो रहा था। तब बाल रूप में श्रीकृष्ण ने कालिय नाग का दमन कर उसे वहां से जाने का आदेश दिया। यह कथा केवल शक्ति और साहस का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि जीवन और प्रकृति में संतुलन कितना आवश्यक है। भारतीय परंपराओं में ऐसी कथाओं के माध्यम से समाज को नैतिक और सांस्कृतिक संदेश दिए जाते रहे हैं।
कृषि और प्रकृति से जुड़ी है परंपरा : भारत लंबे समय तक मुख्य रूप से कृषि प्रधान समाज रहा है और आज भी बड़ी आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है। बरसात के मौसम में खेत, जंगल और प्राकृतिक क्षेत्र हरे-भरे हो जाते हैं। इसी मौसम में सांपों सहित अनेक जीव अपने प्राकृतिक आवास से बाहर दिखाई दे सकते हैं। भारतीय समाज ने प्रकृति के विभिन्न जीवों और तत्वों को सम्मान देने की परंपरा विकसित की। नागपंचमी भी इसी व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का हिस्सा मानी जा सकती है।
सांप पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं और अनेक प्रजातियां चूहों जैसे जीवों की संख्या नियंत्रित करने में योगदान देती हैं। इसलिए किसी भी सांप को केवल भय या अंधविश्वास के कारण नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है। यदि किसी घर या आबादी वाले क्षेत्र में सांप दिखाई दे, तो सुरक्षित दूरी बनाए रखना और प्रशिक्षित वन्यजीव बचावकर्मी या संबंधित विभाग की सहायता लेना बेहतर विकल्प है।
नागपंचमी का संदेश—सह-अस्तित्व और संरक्षण : आज के दौर में जब पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है, नागपंचमी जैसे पर्वों के संदेश को नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति सदियों से पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की शिक्षा देती रही है। नागपंचमी हमें यह याद दिलाती है कि धरती पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं है, बल्कि हर जीव का अपना महत्व और स्थान है।
जंगलों की कटाई, प्राकृतिक आवासों का लगातार कम होना और मानव बस्तियों का विस्तार कई वन्यजीवों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। सांपों और मनुष्यों के बीच होने वाले टकराव की घटनाएं भी अक्सर इसी बदलते पर्यावरण से जुड़ी होती हैं। ऐसे में जागरूकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वन्यजीव संरक्षण की भावना अत्यंत आवश्यक है। धार्मिक आस्था के साथ यदि प्रकृति संरक्षण का संकल्प जुड़ जाए तो पर्व का महत्व और व्यापक हो सकता है।
अंधविश्वास से दूर रहने की जरूरत : नागपंचमी के अवसर पर समाज में जागरूकता का प्रसार भी जरूरी है। सांपों को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं और अंधविश्वास प्रचलित हैं। सभी सांप जहरीले नहीं होते और सांप सामान्यतः मनुष्य से दूर रहने का प्रयास करते हैं। सांप दिखाई देने पर उसे मारने की बजाय सुरक्षित दूरी बनाए रखनी चाहिए। किसी भी सर्पदंश की स्थिति में झाड़-फूंक या घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय तत्काल नजदीकी अस्पताल पहुंचना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार सर्पदंश को लेकर समय पर वैज्ञानिक और चिकित्सकीय उपचार बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए नागपंचमी का पर्व आस्था के साथ-साथ लोगों को वन्यजीवों के प्रति सही जानकारी और जागरूकता अपनाने की प्रेरणा भी दे सकता है।
देशभर में अलग-अलग परंपराएं : भारत के विभिन्न राज्यों में नागपंचमी अलग-अलग परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मनाई जाती है। कहीं नाग मंदिरों में विशेष पूजा होती है, तो कहीं घरों में नाग देवता के प्रतीक स्वरूप का पूजन किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व का संबंध खेतों, वर्षा और कृषि जीवन से भी जोड़ा जाता है। कई परिवार पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
छत्तीसगढ़ सहित देश के अनेक हिस्सों में सावन के धार्मिक वातावरण के बीच नागपंचमी का विशेष महत्व दिखाई देता है। शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है और लोग भगवान शिव तथा नाग देवता की पूजा कर मंगलकामना करते हैं। लोक परंपराओं और धार्मिक विश्वासों के कारण यह पर्व समाज के सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
आस्था के साथ जिम्मेदारी का संकल्प : नागपंचमी हमें भारतीय संस्कृति की उस सोच से परिचित कराती है, जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना गया है। नागों के प्रति श्रद्धा का अर्थ उनके प्राकृतिक जीवन का सम्मान करना भी है। जीवों को अनावश्यक रूप से पकड़ना, उन्हें परेशान करना या प्रदर्शन का माध्यम बनाना इस भावना के विपरीत है। सच्ची श्रद्धा तभी सार्थक होगी, जब हम प्रकृति और उसके सभी जीवों के संरक्षण के प्रति भी जिम्मेदार बनें।
आज नागपंचमी के पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प ले सकते हैं कि धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की भावना को भी मजबूत करेंगे। नाग देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए हम जैव विविधता के महत्व को समझें, अंधविश्वास से दूर रहें और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाएं। यही इस पावन पर्व का सबसे बड़ा और सबसे प्रासंगिक संदेश है—आस्था भी, जागरूकता भी और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी।


