फिरकापरस्ती और नफरत के फ़िज़ाओं में मोहब्बत का पैगाम बना गुरद्वारा बाबा दीप सिंह शहीद, मुस्लिम लड़की ने गुरद्वारे में नमाज की अदा और मुस्लिम लड़की हक़ से बोली हम लड़कियां रहेंगी तो गुरद्वारे में ही |
मजहब नहीं सिखाता ,आपस में बैर रखना ये पंक्तियाँ ऐसी ही नहीं लिखी गयी | इस बात को चरितार्थ है कहा जा सकता है |
गंगानगर (राजस्थान ) :
यह हुवा ऐसे कि तेजिंदर पाल सिंह टिम्मा जी (एक समाज सेवक ,बहुत ही नेक दिल इंसान ) के फोन की घण्टी बजी। फोन उठाते ही एक लड़की बोली टिम्मा अंकल मैं रजीना मोहम्मद बोल रही हूं हम 30 लड़कियां है बाहर से आई है हमें किसी धर्मशाला में नही रुकना सिर्फ गुरद्वारे में ही रुकेंगे ।

मस्लिम नाम सुनकर टिम्मा साहब को कोई अटपटा सा नही लगा बल्कि महसूस हुआ कि कोई रब्बी रूह है ( ईश्वरीय आत्मा ) जिसे धर्म से प्यार है।और धर्म का मतलब भी समझती है। टिम्मा जी ने आधे घण्टे बाद उन्हें गुरद्वारे में बुलाया।मिलते ही उस लड़की ने फिर वही बात कही की हमें कहीं और नही रुकना बस यही गुरद्वारे में ही रुकेंगे । लड़कियों में 5 मुस्लिम लड़कियां थी 22 हिन्दू लड़कियां थी और 3 सिख लड़कियां थी।लड़कियों की बात सुनकर टिम्मा जी के मन को एक सुकून मिला,और फख्र हुआ कि यही मेरे गुरुनानक साहिब के घर की रहमत है जिसे हर कोई अपना समझता है और अपनापन जताता भी है | टिम्मा जी ने लड़कियों की बात सुन बबलू वीर को बुलाया और बेटियों से अपनत्व में शर्त रखी, कि अगर रहने की ज़िद तुम्हारी है तो एक शर्त हमारी भी है कि आप सभी को दस दिन रुकना होगा और और हर दिन का मेन्यू हमे बनाकर देना होगा कि किस वक्त क्या क्या खाना है। और आपको वही मिलेगा। टिम्मा जी की इस बात पर उन सभी लड़कियों की ख़ुशी को शब्दों में बयां कर नहीं सकते , और सभी कहने लगी कि हमने पहले ही कहा था कि गुरद्वारे वाले मजे हमे कहीं नही मिलने हैं ।पिछले चार दिन से बेटियां गुरद्वारा साहिब रह रही है सेवा भी करती है आज एक मुस्लिम बेटी को गुरद्वारा साहिब में नमाज़ पढ़ते देखा तो गुरबाणी का महावाक्य याद आने लगा “सभै साँझीवाल सदायन तू किसै न दिसै बाहरा जीओ” वाहिगुरू जी ये आपका ही स्थान है जहां कोई मजहबी भेदभाव नही। बस “मानस की जात सभै एको पहचानबो” यही सिद्धांत चलता है अहोभाग्य हमारे जो हमे ये सौभाग्य मिला |